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पुस्तक समीक्षा : खुद से खुद की पहचान कराता शशि दुबे का प्रतिबिंब

राजेश विक्रांत

शशि दुबे लीक से हटकर लिखनेवाले रचनाकार हैं। वे सिर्फ कल्पना के ही घोड़े नहीं दौड़ाते, बल्कि अपने अनुभवों से कहानी का ताना-बाना बुनते हैं। उनके पात्र आम जिंदगी जीने वाले हमारे आस-पास के लोग होते हैं। उनके संघर्ष व खुशियां कल्पना की थोड़ी-सी मिलावट के बाद पाठकों को परोसने की कला में शशि दुबे सिद्धहस्त हैं। ‘मैं बारिश और तुम’ के बाद ‘इच्छामृत्यु’ तथा अब ‘प्रतिबिंब’ में भी शशि दुबे की लेखनी पाठकों के दिलों में उतर चुकी है।
‘प्रतिबिंब’ वाया देहरादून मायानगरी मुंबई की कहानी है। अनामिका और सुनंदा इस कहानी के दो मुख्य पात्र, जाने-अनजाने एक ही जैसी जिंदगी जी रहे थे। दोनों का परिवेश, समाज, रहन-सहन बिल्कुल अलग मगर जिंदगी उतार-चढ़ाव, उनकी खुशी और सबसे ज्यादा मिलता हुआ या यूं कह लो एक जैसा ही उन दोनों का दु:ख, जिसका अंदाजा दोनों को जब तक पता चलता है काफी कुछ बदल चुका होता है, कल तक किसी एक के दु:ख में दुखी होकर उसे समझाने या अपनी राय देनेवाला इंसान किस तरह से बेबस हो जाता है, उस वक्त जब पता चलता है कि उसका दु:ख भी एक जैसा ही है। मिस देहरादून का खिताब जीतने के बाद अनामिका की नई जिंदगी मुंबई से शुरू होती है। मॉडलिंग के बाद फिल्म, गाड़ी, आलीशान घर, खूब पैसे व नाम, इनके बीच अभिजीत जैसे पात्र की हरकतें। अनामिका किसी तरह से बचती बचाती आगे बढ़ती है। अचानक भूचाल आ जाता है। अभिजीत उससे झूठ बोलकर पैसे लेता है और एक दिन तो वह अनामिका को एक डायरेक्टर के सामने परोसने की कोशिश करता है, जो अनामिका को मंजूर नहीं होता वह देहरादून लौट जाती है। दूसरी ओर लातूर की सुनंदा को पति किशन की कमीनगी की वजह से घरेलू नौकरानी बनना पड़ता है। अनामिका और सुनंदा के सपने एक जैसे थे, खुद की पहचान अपने हुनर से दुनिया को दिखाना और अपने साथ अपने लोगों के भविष्य को बेहतर बनाना। छोटे शहर से मुंबई जैसे शहर में अपना मुकाम बनाने की जी-तोड़ कोशिश से अनामिका ने अपने सपनों को सच किया, मगर सुनंदा के सारे ख्वाब अधूरे रह गए। उम्मीद इंसान को जिंदा रखती है। मगर सुनंदा नाउम्मीद होकर भी जी रही थी अपने परिवार को पालने के लिए, खुद का न कोई सपना था न ही कोई अपना सिवाय अनामिका के।
‘प्रतिबिंब’ में नारी का प्यार, सौंदर्य, गुण, मेहनत, समर्पण भाव, सहनशक्ति, दु:ख, आंसू, आक्रोश, जलन, तड़प, सम्मान, दोस्ती, आत्म सम्मान, रिश्ते सब कुछ बखूबी निभा लेने का चित्रण है और उसके साथ-साथ साथ उसी नारी की नफरत की इंतहा भी है।
शशि दुबे कहते हैं, ‘इस कहानी के मुख्य पात्र की जिंदगी मैंने बहुत करीब से देखी है, सुनी है। इन दोनों की व्यथा को समझा है। अपने अस्तित्व व स्वाभिमान को बचाने के द्वंद्व में अनामिका व सुनंदा सहनशीलता की हद लांघकर किस तरह से खुद से खुद की पहचान पाते हैं, बस इतना ही बताने का प्रयास है ‘प्रतिबिंब’ में।’ अनिरुद्ध बुक्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिबिंब’ (१९२ पृष्ठ, हार्डबाउंड) की कीमत ४५० रुपए है।

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