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पुस्तक समीक्षा : हिंदुस्थान की सांस्कृतिक विरासत समाई है -सरयू से सागर तक

राजेश विक्रांत

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के ख्यातिलब्ध और विद्वान अधिवक्ता रवि शंकर पांडेय की पुस्तक ‘सरयू से सागर तक’, आर्षचिंतन-लोकचिंतन एक गंभीर वैचारिक पुस्तक है, जिसमें हिंदुस्थान की सांस्कृतिक विरासत समाई हुई है। दार्शनिक लेखन शैली के वाक्य विन्यास से सजी इस पुस्तक के लेखों के शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह जाते हैं।
अनुभूति में आनंद के असीम पल और कोरोना भय, लोकजीवन के उत्थान में प्रयोग हो आविष्कारों का, इस वक्त विज्ञान मौन- मानवता व्याकुल, समस्या का समाधन होता है विमर्श, प्राचीन व आधुनिक चिकित्सा पद्धति के समन्वय से मिलेगा हल, मानस का वायु तत्व के साथ संयोजन हो प्राण तत्व, धर्म और कर्म ही आस्था का प्रकाशपुंज, मौजूदा काल में जीवन के बदलते आयाम, उत्सव और जीवन का उत्स, प्रकृति के रहस्यों के प्रति जिज्ञासा का परिणाम है धर्म, राजनीतिक कारण से हिंदी आज भी उपेक्षित, बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या, लोक जीवन और मानस, धर्म संस्कृति का हिस्सा है लोकतंत्र का नहीं, प्राण तत्व ही ऊर्जा का अविभाजित स्रोत, तकनीकी दक्षता के दौर में उपभोक्ता बनता समाज, लोकतांत्रिक बन जनता के प्रति जवाबदेह हों, गति में नियति कालचक्र का अभिन्न हिस्सा, जीवन ऊर्जा का स्रोत, इस वक्त आत्मविश्वास जरूरी, प्राचीन के साथ आधुनिक चिकित्सा पद्धति का मेल जरूरी, परोपकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है धर्म, भौतिकता के अभाव में पवहारी बाबा और स्वामी विवेकानंद, समाज को गतिशील करता है मत-मतांतर, चेतन का परिणाम वैचारिक गतिशीलता, व्यावहारिक निदान नहीं है जीवन रेखा रोके रखना, अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र का योगदान, आत्मनिर्भरता स्वयं की पुनर्संरचना, धार्मिक संकल्पना मनुष्य के प्राकृतिक कौतूहल का परिणाम, सरकार की आलोचना का मतलब राष्ट्र विरोध नहीं, उपहास की प्रवृत्ति में अस्तित्व का संकट सन्निहित, प्रतिरोध की शक्ति नहीं तो समाज लोकतांत्रिक नहीं, आस ही विश्वास की प्राणशक्ति है, अनुभव की अपनी सामर्थ्य और सीमा है, इकाई का दहाई में प्रवेश ही सामाजिकता, नागरिक और जनता में हम भारत के लोग हैं, संवेगात्मक प्रवृत्ति बुद्धि के अस्तित्व का कारण, एकाकार से निराकार की यात्रा ही धर्म का उद््गम, ग्रामीण परिवेश में है हमारी असल लोक संस्कृति, लोक संस्कृति का लोकतांत्रिक संस्कृति से टकराव, नियति और नीयत कालचक्र का अभिन्न हिस्सा, जागरूक नागरिक ही लोकतंत्र की आधारशिला, चिंतन की प्रखरता का अर्थ सम्यक ज्ञान, गुण और दोष मान की उपज, सुख व आनंद मस्तिष्क का नैसर्गिक सुख, सत्य और असत्य की अवधारणा, जाती हुई खेप की जिम्मेदारी भी संभालें, सामाजिक न्याय और राजनीतिक विचारधारा, लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता ही बोध का जागरण, गतिशीलता में ही जगत का विस्तार, सर्वकालिकता मानव संवेदना की रीढ़, संस्थाओं का प्रबंधन समाज के लिए चुनौती, नागरिक समाज का मौन भी राष्ट्र की समस्या, तंत्र से संभावनाओं की बाट जोहता जन, राष्ट्रीय चिंतन सामाजिक अनवरत्व की कड़ी, शिक्षा संस्कारों की अविरल धारा, सामाजिक सहजता और सभ्यता, सरयू से सागर तक, आत्मनिर्भरता की पुनर्संरचना तथा अनवरत्व ही जीवन है।
उत्कर्ष पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर द्वारा प्रकाशित ‘सरयू से सागर तक’ की कीमत ५९५ रुपए है। इसका मूल स्वर तो देश की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत है लेकिन इसमें समकालीन राजनीति, समाज व विज्ञान पर भी रोशनी डाली गई है। इसे हर एक हिंदुस्तानी को पढ़ना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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