मुख्यपृष्ठस्तंभपुस्तक समीक्षा : ‘सारी दुनिया की संपत्ति' में हैं घर, समाज, दफ्तर...

पुस्तक समीक्षा : ‘सारी दुनिया की संपत्ति’ में हैं घर, समाज, दफ्तर के भोगे हुए यथार्थ

राजेश विक्रांत

राजेंद्र श्रीवास्तव के कहानी-संग्रह ‘सारी दुनिया की संपत्ति’ में कुल २१ कहानियां हैं। इनके शीर्षक यूं हैं- सारी दुनिया की संपत्ति, पूरी लिखी जा चुकी कविता, चुनरी में दाग, अपराधी कौन?, इतना बड़ा दुख, कोई तकलीफ नहीं, जन्मदिन की पार्टी, हिसाब बराबर!, तलाश, सबक, परछाई, साड़ी, एक और क्लर्क की मौत, कहानी, संपन्नता, तिरस्कार, रिश्ता, याद कीजिए पापा…, कलेजा, मु.का.अ. की दावत और फिर वापसी। इन सभी कहानियों में जीवन की चुनौतियों को चाहे घर, समाज या दफ्तर की हों, दर्शाया गया है। कहानीकार बिना किसी दर्शन को थोपे अपनी बात कह देने में सक्षम हैं।
राजेंद्र श्रीवास्तव के पास कहानी शुरू करने की अपनी एक अलग शैली है। कल छोटी बहन मिनी को लड़के वाले देखने आ रहे थे। उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई थी। उस क्षण तक सब कुछ खुशनुमा था। वह सिर झुकाए हुए अपनी जगह पर बैठ गई। अस्पताल शानदार था। दोनों बातें एक साथ घटित हुई थी। रमाकांत बाबू ने कांपते हाथों से दोहरे किए गए कागज को फिर खोला। दंगे सुबह ही शुरू हो गए थे। दफ्तर का आखिरी दिन है। इसलिए उनकी कहानियों के पात्र अपने पास पड़ोस के आम आदमी महसूस होते हैं। सारी… का विकास, चुनरी… के गोविंद प्रकाश, अपराधी की सुनीता, इतना बड़ा… के नारायण पारीकर, कोई तकलीफ के यूनियन लीडर व साहब लोग, हिसाब… की विजया, सबक के सतीश कुमार, साड़ी की रमा, एक क्लर्क… के रमाकांत बाबू, संपन्नता के विनायक, तिरस्कार की सावित्री, याद कीजिए… का अजय व कलेजा का प्रबोध जैसे पात्र आपको हर जगह मिल जाएंगे।
राजेंद्र श्रीवास्तव की कहानी कहने की शैली अनुपम है। जन्मदिन… में जब विचित्र तरह से व्यंजनों की सूची आती है, तब भूख शब्द की उपस्थिति महसूस होती है। तिरस्कार की सावित्री, साड़ी की सास-बहू तथा संपन्नता के विनायक बाबू जैसे चरित्र जिंदगी के उतार-चढ़ाव से पैदा होते हैं। मार्मिक व सरल भाषा ने कहानियों को नया रूप दिया है। अगर पाठक पूरी लिखी जा चुकी कविता शीर्षक वाली कहानी का निहितार्थ समझ लें तो जीवन और शब्द का सहजीवी रिश्ता भी जगमगा उठता है।
ये सभी कहानियां वागर्थ, हंस, कथादेश, लोकमत समाचार, नवनीत, मेरी सहेली, मनोरमा, पहल, हम लोग, जनसत्ता मेल में छप चुकी हैं। राजेंद्र श्रीवास्तव एक राष्ट्रीय बैंक में वरिष्ठ अधिकारी हैं। वे कहानी, नाटक, आलोचना व संपादन में सक्रिय हैं। उनकी प्रकाशित कृतियां हैं- ‘अभी वे जानवर नहीं बने’, ‘कोई तकलीफ नहीं’, ‘दु:खाच सावज’ (कहानी-संग्रह), ‘सुबह के इंतजार में’ (नाटक), ‘कागज की जमीन पर’ (संपादक), ‘हिंदी कहानी: उद्‍भव और विकास’, ‘हिंदी उपन्यास: उद्‍भव और विकास’ (आलोचना) तथा विश्वविद्यालयों के लिए कुल दो पुस्तकों का लेखन। सारी दुनिया की संपत्ति को मौजूदा समय के अग्रणी प्रलेक प्रकाशन, मुंबई के साहित्यप्रेमी प्रकाशक जीतेंद्र पात्रो ने बड़ी खूबसूरती से प्रकाशित किया है। आवरण, साज-सज्जा, छपाई उच्च कोटि की है। १९६ पृष्ठों के हार्ड बाउंड संस्करण का मूल्य ५७५ रुपए है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

अन्य समाचार