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पुस्तक समीक्षा : ३१ वर्षों की साधना का सुपरिणाम …‘जयशंकर प्रसाद महानता के आयाम’

राजेश विक्रांत
मुंबई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय कृत जयशंकर प्रसाद महानता के आयाम को यदि महाग्रंथ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
जयशंकर प्रसाद का सर्जनात्मक व्यक्तित्व एवं संपूर्ण साहित्य इतना मनोहर, बहुरंगी, वैविध्यपूर्ण और कालजयी महत्व का है कि वह हर आलोचक और साहित्यकार के समक्ष एक चुनौती की तरह स्थापित है। यही कारण है कि हर आलोचक को कभी-न-कभी उससे टकराना पड़ता है और वह अपनी मानसिक क्षमता एवं समझ के अनुसार, उसका विश्लेषण तथा मूल्यांकन करता है। प्रसाद जी हिंदी के सबसे बुद्धिवादी एवं पौरुषवान कवि हैं, जिनकी क्रांतिदर्शी चेतना अत्यंत सूक्ष्म, महीन एवं संकेतगर्भी है। डॉ. उपाध्याय ने प्रसाद के व्यक्तित्व व कृतित्व के हर पहलुओं को इस ग्रंथ में विस्तार से प्रस्तुत किया है। जीवन और व्यक्तित्व के अनछुए संदर्भ, आरंभिक काव्य: विराट संभावना का उन्मेष, छायावाद का घोषणा-पत्र: झरना, आंसू: एक पुनर्पाठ, तरल सौंदर्यबोध के प्रगीत और लंबी कविताओं का औदात्य, प्रसाद का चंपू काव्य, महात्मा गांधी और जयशंकर प्रसाद, ‘कामायनी’ में प्रकृति-चित्रण, स्त्री विमर्श और प्रसाद काव्य के श्रेष्ठ नारी चरित्र, कामायनी: एक उत्तर-आधुनिक विमर्श, कामायनी: महाकाव्य का अभिनव प्रतिमान, कामायनी: परवर्ती प्रभाव- संदर्भ, प्रसाद परंपरा के कवि- आलोचक मुक्तिबोध, हिंदी का प्रथम पद्य नाटक: करुणालय, नाटकों की कालजयी गीतियां, अप्रतिम सर्जनात्मक प्रतिभा की रंग-दृष्टि का स्फुरण और विकास इतिहास और राष्ट्रीय चेतना का महाकाव्यात्मक विन्यास, इतिहास और युग-बोध का संश्लिष्ट चित्र, ध्रुवस्वामिनी: रंग बोध का प्रकर्ष, हिंदी की पहली एकांकी: एक घूंट, कामना की प्रतीकात्मकता, कंकाल का यथार्थ दर्शन, जीवन के गूढ़ रहस्यों की सहज अभिव्यक्ति: तितली, विराट सृजन का मंगलाचरण: इरावती, हिंदी कहानी का आकाशदीप, प्रसाद की कहानियां: शिल्प का ताजमहल, जयशंकर प्रसाद का काव्य-चिंतन और आलोचनात्मक प्रदेय, प्रसाद साहित्य में राष्ट्रीय चेतना, जयशंकर प्रसाद के पुनर्मूल्यांकन के आयाम तथा विश्व के महाकवि और जयशंकर प्रसाद इन अध्यायों में लेखक ने प्रसाद गाथा पेश की है। लेखक के अनुसार, ‘प्रस्तुत ग्रंथ का लेखन ३१ वर्षों की साधना के उपरांत संपन्न हुआ है। प्रसाद का सक्रिय रचनात्मक लेखन भी ३१ वर्षों का ही है। मैंने प्रसाद जयंती ३० जनवरी, १९९१ को इसका लेखन आरंभ किया और ३१ जनवरी, २०२२ को इसे लिखकर पूर्ण किया है। यह प्रसाद के रचनाकार के साथ आंतरिक संलग्नता का भी अनूठा उदाहरण है।’ प्रसाद का सर्जनात्मक व्यक्तित्व महाकवि, उच्चस्तरीय नाटककार, यथार्थ दृष्टि-संपन्न उपन्यासकार, कलात्मक अंतर्विधान से परिपूर्ण कहानीकार, विश्वस्तरीय निबंधकार, अंतर्दृष्टि-संपन्न आलोचक, बड़े सिद्धांतशास्त्री, इतिहासवेत्ता और संस्कृतिचेता दार्शनिक की सर्जनात्मकता का अपूर्व संश्लेषण है।
ग्रंथ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, अश्वघोष, भास, भारवि, भवभूति, जायसी, तुलसी और रवींद्रनाथ ठाकुर व होमर, वर्जिल, दांते, मिल्टन, गेटे और इलियट विश्व के इन श्रेष्ठतम महाकवियों से प्रसाद का कवि-व्यक्तित्व और ‘कामायनी’ तुलनीय है और श्रेष्ठ है। राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ४६२ पृष्ठ के इस ग्रंथ का मूल्य १,४९५ रुपए है।

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