मुख्यपृष्ठनए समाचारपुस्तक समीक्षा: गीत-संगीत से बन गया ‘तिनकों का राजमहल'

पुस्तक समीक्षा: गीत-संगीत से बन गया ‘तिनकों का राजमहल’

राजेश विक्रांत

कवयित्री व गायिका लाली मिश्रा के प्रथम काव्य संग्रह ‘तिनकों का राजमहल’ की जड़ें गीत-संगीत में हैं। लाली को बचपन से ही गीत-संगीत से बड़ा लगाव था। फिर उसमें कविता भी जुड़ गर्इं और सोने पर सुहागा हो गया। पुस्तक के ‘मेरे दो शब्द’ में कवयित्री ने लिखा है कि ‘मैंने वैâसे आखिर इतनी कविताएं लिख डालीं! आदमी कितनी भी बड़ी-बड़ी डिग्रियां क्यों न ले ले, परंतु कविता लिखने की शायद कोई डिग्री होती ही नहीं। मुझे लगता है कि यह प्रतिभा शायद माता सरस्वती का वरदान है। मेरी जिंदगी की शुरुआत तो संगीत के सुरों से हुई थी। संगीत से मुझे उतना ही लगाव है जितना कि माली को अपने बाग से, मां को अपने बच्चे से या फिर भगवान को अपने भक्तों से। फिर भी न मालूम क्यों, जब भी मैं पढ़ाई करने या होमवर्क करने बैठती तो पहले एक कविता लिखती फिर आगे का काम दिखाई पड़ता। पहले तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया, परंतु जैसे-जैसे मेरा काव्य-लेखन आगे बढ़ा, मुझे इस काम में कुछ अधिक ही आनंद आने लगा।’
इसी आनंद का परिणाम है ‘तिनकों का राजमहल’। इसमें कुल ८२ कविताएं हैं। पहली शीर्षक कविता है जबकि ‘मां को नमन’ आखिरी कविता। वैसे तो संग्रह की सभी कविताएं प्रभावित करती हैं लेकिन क्या कीजै, झूठी आस, हादसा, गुनाह, राह, जमाना, मौन हो जाए, प्रेम की भाषा, मां, पूज्य पिताजी, रिश्ते, किस्मत, हकीकत, प्रतीक्षा, जीवन ज्योति, मेरा अरमान, माटी की मूरत, प्रेम कहानी, तुम्हारे बिना, नव प्राण, क्या हो तुम, तेरी बदौलत, संघर्ष, वरदान, प्यार, मैं कविता, दुहाई आदि कविताएं कुछ ज्यादा ही मधुर हैं।
शीर्षक कविता ‘तिनकों का राजमहल’ में वे लिखती हैं- पत्थरों से दोस्ती कर ली, ठोकर खाना सीख लिया। गुलाब से दोस्ती की, मुस्कुराना सीख लिया। कुछ लोग वेवजह मुझ पर उंगलियां उठाते रहे, मैंने उनसे भी प्यार निभाना सीख लिया। टकराती रही मेरी आवाज पत्थरों से, मैंने अपने होंठों को सीना सीख लिया। बड़ी खुशियों के लिए देखा छोटी खुशियों को सूली चढ़ते, मैंने छोटी खुशियों में बड़ी खुशियां तलाशना सीख लिया। दुनिया बनाती रही ख्वाबों का राजमहल, मैंने तिनकों का राजमहल बनाना सीख लिया!
इसी तरह से एक और कविता ‘मां’ में कवयित्री की भावनाओं का सृजनात्मक रूप दृष्टव्य है- दुनिया की हर दौलत से बढ़कर, इस जहां की सबसे कीमती वस्तु है मां। सीप के मोती से कहीं निर्मल है मां। हीरों की असीम चमक से हटकर है मां! गंगा की पावनता है मां! आकाश की निश्छलता और चांदनी की स्निग्धता होती है मां! अंधकार में प्रभा-पुंज है मां। देव-वीणा के तारों की झंकार होती है मां। मनुष्य की उत्पत्ति का कारण है मां।
लाली मिश्रा के अनुसार, ‘अब तो ऐसा हो गया है कि मैं अपने दिल के इशारों पर चलनेवाली कठपुतली बन चुकी हूं। जब भी दिल ने चाहा, कागज-कलम ले बैठ जाती हूं और दिल की उन पुकारों को कागज के पन्नों पर अंकित कर डालती हूं। जब कोई सहेली मेरी कविताओं को पढ़कर कहती कि तुम फैंस इतना बढ़िया लिख लेती हो तो मैं झेंप-सी जाती हूं और लिखते वक्त उसके शब्द मुझे एक नई शक्ति, नई ताकत से भर देते हैं। मैं उनकी प्रशंसा को अपने काम को और अधिक बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल करती हूं। उनकी और अधिक प्रशंसा प्राप्त करने के लिए मैं सतत लिखने में जुट जाती और नित्य नई कविता की तलाश करती रहती हूं।’ ‘तिनकों का राजमहल’ को पूजा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, बिहार (गीतकार हरिश्चंद्र) ने प्रकाशित किया है। चित्रशाला का बनाया आवरण आकर्षक है। १०० पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य १०० रुपए है।

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