दोनों चले

यह भी चले वह भी चले
दोनों चले कहते हुए, वे सब के सब
चले गए उधर अकल बेचकर।
और हम इधर जहां रोजी है
रोटी है विचार है मानवता है
प्रेम है भाईचारा है और एक खुशनुमा
वातावरण है जीने का।
यथार्थ के इसी शालीन मोड़ पर
उग आया एक कारवां जनपक्ष का
अपने स्वाभिमान के साथ।
कालांतर में जिसे हम जनवाद कहते हैं।
खुद को आजाद कहते हैं।।
अन्वेषी

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