मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य: करम'न कौ दोस

ब्रजभाषा व्यंग्य: करम’न कौ दोस

संतोष मधुसूदन चतुर्वेदी

या बार बरखा नें अपुनी आँखें दिखायबो अभई सों सुरू कर दियौ हतै। सबन कौं पानी की फिजूलखर्ची रोकुबे कौं कमर कसनी परैगी। आइबे बारे दिनन मै बिजुरी औरु कम वर्षा की वजै सों सपूरे देस मै पानी कौ भंडार’न नाँय है पायौ या लीये पीबे, न्हावै, कपरा-लत्ता धोयबे के पानी की बहुतई किल्लत होयगी। अबहू हुसिआरी नांयनें बरती तौ बैठकें अपने करमन कौ रोनों परैगो।
बापू- ‘लाला रे! मोकूं पीबे कौं इक लुटिया फरीज कौ ठंडो पानी देयगो काह? भौत पियास लग रही है।’
लाला- ‘बापू, आज घर मै नैंकु पानी नांयनें। सबेरें आँख नाँय खुली सो नल सौं पानी नाँय भर पायौ। दम दम पै बत्ती जाय रही हतै। हर दिन कौ पीटनौं है गह्यो हतै। या समै पानी नाँय अमिरत है गयौ है।’
बापू- ‘लाला, तोसों कित्ती दम कही हतै की समै सों उठकें पानी ठंडों करबे कौ रक्ख देओ कर।’
लाला- ‘बापू, मोकूं कहा पतौ ई की सबेरें सबेरें बत्ती चली जाबैगी।’
बापू- ‘जिन नें न मानी बड़ेन की बात, बिनके रहेंगे खीपरा हाथ। कै सोबै राजा कौ पूत, कै सोबै जोगी अबधूत, कै सोबै जाकें माई न बाप, कै सोबै जो आपम धाप।’
लाला- ‘बापू, आपकी बातें मेरी कछु समझ मै नाँय आय रही।’
बापू- ‘लाला, दस-दस बजे तलक सोइबो काम नाँय आबेगौ। यै नाँय की सबेरें सिदौसी जगकें पानी भर लेउ करै।’
लाला- ‘बापू, मै अभाल नदी पै जाय रह्यो। म्हाँ सों कपरा लत्ता हूं धोय लाऊंगो, नहाऊ आऊँगो, दो करसा पानी हूँ भर लाऊंगो।’
बापू- ‘मेरौ लाला री बडौ हुसिआर, चलौ है रीते करसा लै लै कें। बौ तौ पौचों पल्लीपार, लै आयो करसा भर भरकें।’
लाला- ‘नासै रोग हरै सब पीरा, जो सुमिरै, हनुमत बलबीरा।’
बापू- ‘लाला, जब छन्नी मै दूध छानोगे औरु करमन कौ दोस देओगे यै अच्छी बात नायनें या लियै पानी की कमी हैबे सों पैलें, वा कौ इंतिजाम करनों परैगो।’
लाला- ‘बापू, तिहारी बात मेरी लट्ठ खोपरी मै आय गयी की जागै सो पावै, सोबै सो खोबै।’

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