मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य : ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’

ब्रजभाषा व्यंग्य : ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’

संतोष मधुसूदन चतुर्वेदी

या श्लोक कौं बृहदारण्यकोपनिषद् सों लियौ गयौ। याकौ अर्थ हतै कि मोकूं असत्य ते सत्य की तरफ लै चलौ। मोकूं अंधकार सों प्रकाश की ओर लै चलौ। मोकूं मृत्यु से अमरता की ओर लै चलौ। ‘सदा दिवारी संत की, आठों प्रहर आनंद। हिरदय में घोर अंधेरौ है, दीयौ जराऔ असंत।।’ बाहिर तौ भौत उजेरौ ऐ, भीतर के अंधेरे कूं दूर करबे के लीयें गियान कौ दीयौ अपुने हिरदय मै जरामते भये या दिवारी के परब पै गियान की देवी सरसुती कौ सम्मान कर लछिमी कौं पाइबे के लियें हम परयास करें। तातौ खाय पटे मै सोबै, ताकौ वैद कहाँकर रोबै घर मै घरबारी के हाथन कौ बनौ खाइबो ठुकरामते भये होटल औरु बजारन मै अल्लौ मल्लौ खाइकें अपुने सरीर के भीतर रोगन कौं जाने अनजाने मै निमंत्रित कर दवाखानेन कौ ही भलौ करि रह्ये ऐं। दिवारी कौ तौहार तौ वनिकन कौ हतै। वैसें अपुने देस मै होरी, दसहरा, दिवारी, रक्षाबंधन (श्रावणी) सबरे तौहार सब मिलकें मनामतें।
माया महाठगिनी हम जानी। चुनाव सूं पहलै इक नेता नें पंद्रह लाख रुपय्या हरेक के खाते में डारकें लखपति बनाइबे की बात कही हती लेकिन हम लखपति तौ नाँय करजपति जरूर बन गये। जब बा नेता की सिरकार बन गयी तौ बानें बाकूं चुनावी जुमला कह दीयो।
लछिमी तब खुश होयगी जब हम बाँकू रोकबे के लीयें कछु अपुनी तरफ सूं उपाऊ करिंगे। नर्इं तौ सदा ही रंक बने रहिंगे। उत्ते ही पांव पसारौ, जित्ती लांबी सौर होय। दुकानन मै जगै जगै इक रुपय्या मै फ्रीज, टीवी, लत्ता धोयबे की मसीन आदि विघ्यापनन के जरिया लालच दियौ जाय रह्यो हतै। हम इक रुपय्या के मोह मै फँसकें करजा अपुनी खोपरी पै चढ़ाय रह्ये ऐं। लछिमी मईया सबन कूं रंक ते श्रीमंत बनाबेंगी। हिरदय मै गियान कौ दीपक जरैगौ तौ सरसुती मईया हू सबकौ भलौ करिंगी। गणेस जी बाबा तौ बुद्धि के दैबे बारे हतें सो बे हूं बृद्धिमान बनामिंगे। इन बातन पै धियान देओगे तौ कछू दिन मै ही धन, गियान, सुख समृद्धि तुमारे जौरें हर टैम बनी रहेगी।

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