मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य: ‘बच्चा' न कूं सिच्छा

ब्रजभाषा व्यंग्य: ‘बच्चा’ न कूं सिच्छा

संतोष मधुसूदन चतुर्वेदी

काह बात हतै आज अतुल जी कछू उदास दिख रह्येएॅ? अतुल जी मन कूं मसोसते भये बोले- ‘मेरी छोरी सासरे सों आइकें घर पै बैठ गयी ह्ये।’
रीता देवी बोली- ‘अतुल जी, छोरी तौ राखी पर आयी हती ना…तौ यामें कौन सी बड्डी बात हतै।’

अतुल जी बोले- ‘नायजी…छोरी हमेसा के लियें अपने भर्तार कूं छोड़कें आय गयी औरु बोल रई ऐ की मोकूं तलाक दिवाय देओ बापू।’

मैंने फिर अतुल जी सौं पूछौ- ‘अपुनी छोरी सौं पूछौ…भर्तार कें कहा समस्या हतै बावूँâ…जो ऐसौ वैâ रईयै।’

हां जी, मैंने छोरी सों पूछौ- ‘बौ कहै की बापू आपके जमाई की कमाई कम हतै, बौ मेरौ शौक पूरौ नाँय कर पाबै। अभई तो हम दो ही हतें मान लेओ और कुनबा होयगौ तो फिर यै काह कर पाबैगौ या काजें मोय ऐसे के संग नाँय रहनौ जाकी कमाई कम होय।’
‘मैंने जो बात अतुल जी सौं कही, बौ बात मैं हर मईया-बापन सौं कहबौ चाहौं-सभई दोऊ कान खोलकें सुनौ। अपने बच्चन कूं ऐसी सिच्छा देओ की जो चीज आपकूं मईया-बापन कें मिल रही हतै बौ जरूरी नायनें की भर्तार कें हू मिलैगी। बच्च’न कूं आप बढिया सों बढिया खाइबो खबायौ। आप अच्छी सों अच्छी चीज दिबाओ। अच्छे सौं अच्छी जगै घुमाओ-फिराऔ तौ संग मै बिनकौं येहू समझाओ की कोऊ जरूरी नाँयनें की यै सब बाकूं भर्तार के घर जाइकें हू मिलैगौ। बाप के घर में बत्ती जामते ही इनवर्टर चालू है जाबेगौ तौ भर्तार केंऊ चालू होयगौ। मईया-बापन नें आपकौं जनमदिन पै पच्चीस हजार कौ उपहार दीयौ तो भर्तार हू बित्ते कौ ही दिबावेगौ। बाप के इहाँ कार में घूमौ तौ आप भर्तार के यहां हू कार में घूमौ। है सवैâ की महाँ पै बाइसिकिल हू न होय।’ अतुल जी सुनते जाई रह्ये। फिर अतुल जी गहरी सांस छोरते भये बोले- ‘आपकी बात साँची है। मैं छोरी कूं यै समझाय नाँय पायौ। बिनकी आंखन सौं अंसुअन की धार टपकबे लगी…रूंधी भयी आवाज सूं कहबे लगे…छोरी पहिले सों ही काऊ के पियार मै पागल हती…दबाव मै बियाओ तौ कर लियौ बानें, अब बौ तलाक के बहाने ढूंढ रही हतै। जमाई तौ हीरा हतै मेरौ…जब अपनौ सिक्का मै ई खोट होय तौ दोस कौंनै देओं।’

 

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