मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य: बुढऊ के मन की बात!

ब्रजभाषा व्यंग्य: बुढऊ के मन की बात!

संतोष मधुसूदन चतुर्वेदी

अखबार बारे कौ छोरा एक घर में अखबार डारबे गयौ, बावूंâ   घर के भार लगौ डाक बक्सा बंद दिखो तौ बानें घर कौ दरवज्जौ खटखटायौ। एक बुड्ढे नें काँपते भये पाय’न सों धीरें-धीरें चलत भये दरवज्जौ खोलौ।
छोरा ने पूछौ, बक्सा पै तारौ काइकों लगौ भयौ एॅ? बुढ़ऊ नें जवाब दियौ, मैनें याकौ जानबूझवेंâ बंद करि रखौ एॅ औरु हंसत भये बोले, मैं चाहौ की आप हर दिना दरवज्जौ खटखटाइवेंâ या घंटी बजाइवेंâ मोवूंâ अखबार देओ।
घंटी!!
छोरा नें सोचवेंâ कही, यै हम दोनो’न के लीयें असुविधाजनक हतै, यामें मेरौ अधिक समय लगेगौ।
बुढऊ बोले, मै तुमकौं दरवज्जौ खटखटाइबे या घंटी बजाइबे के लियें हर महीना इक हज्जार रुपईया अलग्ग सूं देंगो। अगर कबू ऐसौ दिन आबै जब तुम दरवज्जौ खटखटाऔ और मैं जवाब न देओं, तौ तुम पुलिस कौं सूचित कर दीजो।
छोरा चौंकत भये पूछ’न लगौ, काइकों?
बुढऊ बोले, हाल ही में मेरी घरबारी कौ निधन है गयौएॅ, मेरौ बेटा विदेश मै हतै या कारन मै इकेलौ ओं, का पतौ ऊपर बारौ मोवूंâ अपने जौरें कब बुलाय लेय! छोरा नें देखौ की वौ बुढऊ भरे मन औरु आँखन मै अंसुआ लियें बोल रह्यो।
बुढऊ ने आगें कही, मै कबू अखबार नाँय पढूं और केवल दरवज्जे पै दस्तक या घंटी की आवाज सुनबे औरु काऊ पैचान बारे कौं देखबे, बिनसूं बात करबे के लीयें ही याकों खोलौं। बुढऊ नें छोरा कौ हाथ पकड़वेंâ बावूंâ अपने छोरा कौ विजिटिंग कार्ड देमते भये कह्यो, अगर काऊ दिना मै दरवज्जौ नाँय खोल पाओं तौ पुलिस के संग मेरे बेटा कौं हू खबर कर दीजो।
यानी दुनिया मै हमारे आस-पास ऐसे वैâउ इकेले बूढ़े लोग होमिंगे। आप सोचौगे की आखिर ऐसे लोग आपकौ सबेरैं-संजा व्हॉट्सऐप पै मैसेज काइकों भेज रह्ये हतें? असल में यै दरवज्जौ खटखटाइबे या दरवज्जे की घंटी बजाइबे के समान हतै। हमें संदेश देनौ एॅ की हम अभी भी खुस एॅ। आप अपने अड़ोस-पड़ौस के बुजुर्गन कौ व्हॉट्सऐप चलाइबौ सिखाऔ, ताकि काऊ दिना अगर कोऊ मैसेज न आबै तौ आप कम सों कम यै पूछ सकौ की वौ व्यक्ति बीमार है सवैâ या बा के संग कछु बुरौ भयौ एॅ।

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