मुख्यपृष्ठनए समाचारब्रजभाषा व्यंग्य: सबद'न कौ झैरीलौ बम्ब!

ब्रजभाषा व्यंग्य: सबद’न कौ झैरीलौ बम्ब!

संतोष मधुसूदन चतुर्वेदी

हमारे समाज या घर’न में आज के समै जो दिमागी उलझनें बढ़ रईऐं, वा की जड़ तक जायौ जाए तौ हमेसा वाके पीछे काऊ और कौ हाथ होमते। वौ यै नाँय जानें की नादानी मै या जानबूझकें बोले जाइबे वारे सबद काऊ की हँसती-खेलती जिनगी कौं तबाह कर सवैंâ। झैरीले सब्दन के कछु उदाहरन जैसें-
रामवती ने ओमवती सौं पूछौ की लल्लू हैबे की खुसी में तेरे घर बारे नें तोकूं काह तौफा दियौ?
ओमवती बोली- कछु नाँय!
रामवती नें सवाल दागते भये पूछौ- काह यै अच्छी बात हतै? का वाकी नजर में ओमवती तिहारौ कोऊ मोल नांयनें?
सबदन कौ यै झैरीलौ बम्ब गेरते भये रामवती, ओमवती कूं चिंता में छोड़कें चलती बनी। संजा कूं ओमवती कौ घरबारौ आयौ तौ बानें ओमवती कौ म्होढ़ो टिकियाँ जैसौं फूलौ भयौ देखौ तौ बिनमें खूब जमकें महाभारत की रार मच गयी। घर बारे’न कूं एक दूसरे’न नें खूब खरी-खोटी, जरी-कटी सुनार्इं। अंतत: सुरेश-ओमवती मै तोड़ा टूटन है गयौ। समस्या कौ सिरीगनेस रामवती के तौफा बारे सवाल पूछबे की बजै सौं भयौ? या तरियाँ के फिजूल के सवाल नादानी में या बिना मकसद के हम पूछ बैठें। जबकि हम यै भूल जामें की हमारे ऐसे सवाल सुनबे बारे के दिल में नफरत या मोहब्बत कौ कौन सौ बीज बोय रहेएँ। अब दूसरौ उदाहरन देखौ-
सुधाकर- तुम कहां पै काम करत हौ?
पवन- रामदीन की दुकान में।
सुधाकर- कित्ती तनख्वाह देबै रामदीन?
पवन- पंद्रह हज्जार।
सुधाकर- बस्स पंद्रह हज्जार रुपइया! तिहारी जिनगी वैâसे कटै इत्ते से पइसान मै?
पवन (गहरी सांस खींचते भये)- छोड़ यार! का बताऔं। दोनों’न की बातचीत खत्म भई। कछू दिनन के बाद पवन अब अपने काम सों अनमनौ हैगौ। पवन नें रामदीन सूं तनख्वाह बढ़ाइबे की मांग कद दई। जावूँâ रामदीन नें नाँय मानी। पवन काम छोडकें निठल्लौ हैगौ। पैलें वा के पास काम हतो अब काम नाँय रह्यो। या लियें हमें सोच समझकें बोलनों चईयें यै नाँय की चमड़ा की जुबान सूं कछु बोल देओ।
याद रखौ की जुबान सूं निकले सबद दूसरे पै बड़ौ गहरौ असर डारैं। बेशक कछुन की जुबान सों शैतानी के बोल निकसें। हमारी रोजाना की जिनगी मै बहुतेरे सवाल हमें भौत मासूम लगें लेकिन होमें भौत घातक।

अन्य समाचार