मुख्यपृष्ठस्तंभब्रजभाषा व्यंग्य: आभासी-साँची मित्रता!

ब्रजभाषा व्यंग्य: आभासी-साँची मित्रता!

संतोष मधुसूदन चतुर्वेदी

एक छोरा हतो बा के भौत मित्र हते या बात कौ बा वूँâ बहुतहि घमंड हतो। बा के पिता कौ एक ही सखा हतो लेकिन बौ हू सच्चौ। मित्रता बो ही हतै जामें इक-दूसरे के सुख-दुख के समै संग देबें। दोस्ती की कर्ण ने जाने मरते दम तलक दुरजोधन कौ संग नाँय छोडयो, मित्रता की सुदामा नें जानें कृष्ण पै आइबे बारी विपत्ति अपुने ऊपर लैकें खुद दरिद्र बन गयौ, अर्जुन ने कृष्ण कौ संग नाँय छोडयो औरु विजयश्री पायी। यारी करी सुग्रीव नें भगवान श्रीराम को सीता कौ खोजने में आसानी भयी। दोस्त वही जो सही समै, सही बखत पै सही सलाह दैकें मित्रता धर्म निभामें। ऐसे बहौत उदाहरण हतें लेकिन आजुकल तौ…
जब तलक पूंजी गांठ, यार संग ही संग डोलें।
पूंजी रही न गांठ यार मुख सौं नहीं बोलें।।
जेब मै धन है तौ मित्र-यार-दोस्त संग घूमिंगे। जेब कौ धन खतम तौ सीधे म्हो बात नाँय करँगे।
इक दिना पिता, पुत्र सों बोलौ की तेरे बहुतहि मित्र हतै उनमें सूं आज रात तिहारे सबसों अच्छे मित्र की परीक्षा लेनों है। पुत्र झट सों तय्यार है गयौ। रात कों एक बजे दोनों छोरा के सबसों घनिष्ठ मित्र के घर पौंचे। पुत्र नें मित्र कौ दरवज्जौ खटखटायौ, दरवज्जौ नाँय खुलौ। बार-बार दरवज्जौ खटखटाइबे के बाद अंदर सों पुत्र कौ मित्र अपनी मईया सूं कह रह्यो…मईया कह दईओ की मै घर पै नाँयनों। यै सुनकें पुत्र उदास है गयौ। निराश हैकें दोनों लौट आए। फिर पिता अपने पुत्र सों बोल्यो! आजु तोय अपने सखा सों मिलवाइबे लै चल रह्यो।
दोनों पिता के सखा के घर पहुंचे। पिता ने अपने सखा कौं अवाज लगाई। उत्तिन सूं जवाब आयौ की ठहरियो सखा, दो मिनट मै दरवज्जौ खोल रह्यो।
जब दरवज्जौ खुलौ तौ पिता के सखा के एक हाथ मै रुपईया की थैली और दूसरे हाथ में तरवार हती। पिता ने पूछी, यै का सखा!
तब सखा बोलौ…अगर मेरे सखा ने १ बजे रात कौं मेरौ दरवज्जौ खटखटायौ है तौ जरूर वौ मुसीबत में होइगौ और अक्सर मुसीबत दो तरियां की होमें या तौ रुपा पईसा की या काऊ सौं झगरौ है गयौ होय।अगर तुमवूंâ रुपईया की जरूरत होय तौ ये रुपईया की थैली लै जाऔ, काऊ सों झगरौ है गयौ होय तौ यै तरवार लैकें मै तिहारे साथ चल रह्यो।
आजु की आभासी यानी मोबाइल की दुनिया मै मित्रन कौ जमघट लगौ हतै लेकिन सच्चे सखान की परख तौ समै परबे पै ही होबै। तब पिता की आँखन मै आंसू आय गये औरु बिननें अपने सखा सौं कही की सखा मोय काऊ चीज की जरूरत नांयनें, मैं तो बस, पुत्र कौं सखान कौ भेद समझाय रह्यो। सखा मतलब जो खास होय।

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