मुख्यपृष्ठस्तंभब्रेकिंग ब्लंडर : ईडी काल

ब्रेकिंग ब्लंडर : ईडी काल

राजेश विक्रांत

हम न अमृतकाल में रहते हैं न कलिकाल में। हम रहते हैं `ईडी काल’ में। हकीकत में ईडी एक ऐसा काल है जो नेता, मंत्री, अफसर, ठग, माफिया, जालसाज, उद्योगपति आदि का `काल’ बदलने की ताकत रखता है। इन दिनों ईडी के आगमन का संकेत साफ है, `भाई ज्यादा उड़ो नहीं। तुम जिसके साथ हो, जिसके समर्थक हो, वे तुमको नहीं बचा सकते। हमसे बचना है तो हमारे झंडे के नीचे आ जाओ। तब तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। तुम ईडी की चरण रज से भी बच जाओगे।’
आमतौर पर काल के तीन ही प्रकार होते हैं- वर्तमान, भूत और भविष्य। लेकिन पिछले कुछ समय से भाई लोगों ने एक अमृतकाल भी प्रचलित कर दिया है। इसी अमृतकाल का उपहार है ईडी काल। यह सभी काल से घातक, खतरनाक व विनाशकारी माना जाता है। इस काल का आगमन अचानक किसी व्यक्ति के घर, दफ्तर, दुकान या प्रतिष्ठान पर होता है और इसके आगमन के थोड़ी देर बाद सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। ईडी काल का शिकार न हंस सकता है, न रो सकता है। न कुछ कह सकता है। न कोई बयान दे सकता है। किसी की आलोचना करने का अधिकार वह खो बैठता है। इसलिए सयाने लोग कहते हैं कि सब कालों का बाप है ईडी काल। आजकल विपक्षी नेतानगरी में ईडी का खौफ छाया हुआ है। क्यों न छाए? सत्ता पक्ष के पास ईडी जो है। ईडी को एक संकेत मिलने भर की देर है कि वो शिकार पर निकल पड़ती है। फिर छापेमारी, तलाशी, जब्ती की सुखद प्रक्रिया संपन्न की जाती है। इसके बाद ईडी वाले कभी कभार गिरफ्तारी की भी संभावनाएं तलाशते हैं, इससे दबाव ज्यादा बनता है।
कहते हैं कि ईडी एक विशेष वित्तीय जांच एजेंसी है। यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग का हिस्सा है। यह भी कहते हैं कि जहां धन से संबंधित गड़बड़ होती है, वहां ईडी दखल देती है। किसी ने यदि फर्जीवाड़े से पैसा इधर से उधर किया है, काले पैसे को सफेद बनाया है, विदेशी मुद्रा से संबंधित कोई कांड किया है तो वो ईडी के रडार पर आ जाता है। लेकिन सच्चाई इससे जुदा है। ईडी अपने आका के इशारे पर काम करती है, जो आका कहता है, ईडी उसका पालन करती है। ईडी अक्सर राजनीतिक दांवपेंच के चलते तथा विपक्ष को परेशान करने के लिए, उस पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। जो विपक्षी या उसका करीबी अथवा शुभचिंतक ज्यादा उड़ता है या उड़ने की कोशिश करता है तो ईडी उसके पर कतरती है। ईडी की चरण रज जहां पड़ती है, वह जगह धन्य हो जाती है। वह घर पवित्र हो जाता है। घर वाले को सुर्खियां मिलती हैं, अखबारों में नाम छपता है, टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज चलती है, सोशल मीडिया पर नोटों के बंडल, सोना, चांदी, हीरे, गहने, वायरल होते हैं। घरवाले की नाक ऊंची हो जाती है। मोहल्ले में इज्जत बढ़ जाती है। लेकिन तब कुछ दिलजले इसे तानाशाही या लोकतंत्र की हत्या का प्रयास कहने लगते हैं। आखिर क्या करें वे, उनके पास ईडी नामक हथियार नहीं होता। वे बेबस होते हैं। इन नासमझों को ये नहीं पता होता कि अमृतकाल ही `ईडी काल’ है।
(लेखक तीन दशकों से पत्रिकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

अन्य समाचार