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ब्रेकिंग ब्लंडर : प्रजा-सरकार संवाद

राजेश विक्रांत

प्रजा: जी आप कौन हैं?
सरकार: मैं सरकार हूं। खुशकिस्मत हो कि सरकार खुद चलकर तुम्हारे द्वार आई है।
‘सरकार, कौन सी सरकार? लगता है कि तुम कोई प्रâॉड हो।’
‘खबरदार, जो सरकार को प्रâॉड कहा। सरकार विश्वासघाती हो सकती है, हत्यारिन हो सकती है। धोखेबाज हो सकती है। पीठ में छुरा भोंकने वाली हो सकती है, पर प्रâॉड नहीं। मैं इस राज्य की मालिक सरकार से आया हूं।’
‘कौन सा मालिक? सबका मालिक एक वाला?’
‘नहीं भाई। एक मुख्यमंत्री, दो उपमुख्यमंत्रियों वाली सरकार।’
‘तोड़फोड़ फेम मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्री, जो एक-दूसरे के खिलाफ तलवार खींचे रहते हैं। ये लोग सरकार वैâसे हो सकते हैं? आपसी सिर फुटौव्वल से इन्हें कब फुरसत मिलती है?’
‘अरे भाई, छोड़ो ये सब। ये जान लो कि मैं मुख्यमंत्री सचिवालय कक्ष, कोकण विभाग से आया हूं। पता चला है कि आपने वहां पर आरटीआई की है। कुछ जानकारियां मांगी है।’
‘हां मांगी तो है। लाए हो जानकारी। दो। जल्दी दो।’
‘जानकारी भी मिलेगी। साथ में और भी बहुत कुछ मिलेगा।’
‘क्या मिलेगा? ये लेने वाली सरकार है। वो कुछ नहीं देती। मुझे जानकारी मिल जाए बहुत है।’
‘अरे भाई। ‘शासन आपल्या दारी’ यानी ‘सरकार आपके द्वार’ एक ऐतिहासिक प्रकार का उपक्रम है। अब तक तकरीबन २ करोड़ लोग इसका लाभ ले चुके हैं। इस बार ये लाभ प्राप्त करने की आपकी बारी है। हम आपको उपहार ही देने के लिए यहां पधारे हैं। जहां-जहां सरकार जाती है, वहां कुछ न कुछ देकर ही आती है। अकाल, बाढ़, भूस्खलन, महामारी, दंगा-फसाद, बम विस्फोट आदि। ये सब नहीं होता है तो गोली तो चलती ही है। हम सरकार हैं। कहीं भी खाली हाथ नहीं जाते हैं। हमारा एक प्रतिनिधि पुलिस स्टेशन जाता है तो गोली चला ही देगा। हमारा एक आदमी तो निजी दफ्तर में भी मर्डर कर चुका है। तुमको शायद पता नहीं है कि हमारे बड़े सरकार की वजह से ढेर सारी आबादी कम हो चुकी है। लेकिन तुम ये बताओ कि दूसरे के लिए तुम क्यों फटे में टांग अड़ा रहे हो?’
‘मैं तो हक की बात कर रहा हूं। मेरा एक रिश्तेदार जिस बिल्डिंग में रहता है, उसका रिडेवलपमेंट हो रहा है। डेवलपर ने पहले सभी को ४९५ वर्ग फीट का फ्लैट देने का एग्रीमेंट किया था। तभी एक सज्जन प्रकट हुए। उन्होंने डेवलपर से तोड़पानी की और फ्लैट का एरिया ४७२ हो गया। डेवलपर ने अब तो बिल्डिंग का कंस्ट्रक्शन भी रोक दिया है।’
‘ये बताओ कि आरटीआई से तुम्हारा क्या फायदा होगा?’
‘मेरा निजी फायदा कुछ नहीं है। मेरे रिश्तेदार के साथ बिल्डिंग वालों को भी राहत मिल जाएगी। ये उनका हक भी है।’
‘हक-वक गया तेल लेने। आरटीआई वापस लो।’
‘असंभव। कमान से निकला तीर कभी वापस आया है क्या?’
‘फिर तो, तुम्हारे शरीर से निकली आत्मा भी वापस नहीं आएगी।’
‘क्या मतलब?
‘आरटीआई आवेदन वापस नहीं लोगे तो अगली बार मैं नहीं, बल्कि कुछ बंदूकधारी सेवक आएंगे। वे आबादी कम करने के विशेषज्ञ हैं। उनकी सिर्फ एक गोली से तुम्हारा काम तमाम हो जाएगा। गोली अंदर, दम बाहर। तुम्हारा परिवार, आरटीआई आवेदन के साथ अनाथ हो जाएगा।’
‘इसके बाद आप भी तो फंसोगे।’
‘मेरा कुछ नहीं होगा। भूल गए क्या। हम सरकार हैं। मैं सरकार का प्रतिनिधि हूं और सरकार सर्वशक्तिमान होती है।’
(लेखक तीन दशक से पत्रिकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

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