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ब्रेकिंग ब्लंडर : ध्यान भटकाने की कला

राजेश विक्रांत

इन दिनों हिंदुस्थान में एक कला काफी फल-फूल रही है। ये है ध्यान भटकाने की कला। वैसे तो, हृदय की गहराईयों से या सच्चे मन से, मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने के लिए की गई सुंदर प्रस्तुति को ही कला कहते हैं लेकिन ध्यान भटकाने की कला में सच्चे मन की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। इसमें आपको एक्टिंग करना आना चाहिए। गिरगिट या मगरमच्छ के गुण होने चाहिए। रंग बदलने और आंसू बहाने में एक्सपर्ट होना चाहिए। तब आप मुद्दों से लोगों का ध्यान बखूबी भटका सकेंगे।

६५वीं कला है ये
ध्यान रहे कि हिंदुस्थानी कला का एक समृद्ध और जीवंत इतिहास है, जो २,५०० ईसा पूर्व के गुफा चित्रों से जुड़ा है। हमारे यहां कुछ समय पहले तक ६४ कलाएं ही अस्तित्व में थी, ये ध्यान भटकाने की कला ६५वीं है, जो सन २०१४ में हिंदुस्थान में ही खोजी गई। यानी कि हमारे देश का इस पर कॉपीराइट है। मुद्दों से ध्यान भटकाना, लटकाना, अटकाना आदि इसके उप-प्रकार हैं। इस कला का मुख्य क्षेत्र राजनीति है।

राजनीति में सबसे ज्यादा इस्तेमाल
महान जादूगर के लाल के अनुसार मंचीय जादू में केवल कल्पना का उपयोग करना होता है, इसके बाद सावधानीपूर्वक स्क्रिप्टिंग और अभ्यास करना होता है। लेकिन इसमें सबसे कठिन काम ध्यान भटकाने की कला सीखना है क्योंकि दर्शकों का ध्यान भटकाना एक ऐसा कौशल है जो हाथ की सहज सफाई और चतुर यांत्रिक भ्रमों के निर्माण से कहीं आगे है।

कला और कौशल
यह एक ऐसा कौशल है, ऐसी कला है, जिसे वर्तमान राजनीतिक प्रतिष्ठान ने अच्छी तरह से सीख लिया है और वे देश में सर्वकालिक उच्च बेरोजगारी दर, कुपोषण, भुखमरी, गिरती अर्थव्यवस्था, कमरतोड़ महंगाई, ३० साल के उच्च थोक मूल्य सूचकांक-होलसेल प्राइस इंडेक्स, डीजल पेट्रोल के आसमान छूते दाम आदि को ध्यान भटकाने की कला के सौजन्य से हल करते हैं।
जरूरी मुद्दों से ध्यान भटका दो
इन मुद्दों से सरकार को कोई मतलब नहीं है। इनसे ध्यान भटकाने के लिए नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक, धारा ३७०, राम जन्मभूमि, नागरिक संशोधन कानून आदि का उपयोग करते हैं।

काल्पनिक झुनझुना
अब तो इस देश में यह लगने लगा है कि राजनीति की कला केवल ध्यान भटकाने की कला है। जिन मुद्दों को लेकर हमारे राजनेता और मीडिया सबसे अधिक उत्साहित होते हैं, वे उन वास्तविक मुद्दों पर लगभग कोई असर नहीं डालते हैं, जिनका अधिकांश नागरिक सामना करते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी ढांचे का निर्माण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे जब कोई सामने लाने की कोशिश करता है सरकार उसे नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक, धारा ३७०, राम जन्मभूमि, नागरिक संशोधन कानून आदि का झुनझुना पकड़ा देती है और इस तरह भावनात्मक मुद्दों का उपयोग ध्यान भटकाने और अक्सर संवेदनहीन उन्माद को उत्प्रेरित करने के लिए किया जाता है।
(लेखक तीन दशकों से पत्रिकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

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