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राजेश विक्रांत

एक

मैं `अजानी’ हूं। प्रथम अजानी। मैंने हिंदुस्थान को एक अजानीतांत्रिक देश बनाने की कसम खाई है, जिसमें अजानी (मेरा) और सिर्फ मेरे हित ही सर्वाेपरि होंगे। सही मायनों में अजानीतंत्र को ‘अजानी का, अजानी द्वारा, अजानी के लिए शासन’ के रूप में स्थापित करने की मेरी परम इच्छा है। मैं जब १५-१६ बरस का था तो पहले साइकिल से और फिर स्वूâटर से घर-घर कपड़े बेचने जाया करता था। इसके बाद मैंने अपराधियों व भ्रष्टाचारियों की प्रतिभा का उपयोग किया। आजीवन नैतिकता का शीलभंग न करने की कसम खाई। आज स्थिति ये है कि मैं जो चाहूं कर सकता हूं और कर भी रहा हूं। मैंने ७ लाख से ज्यादा की आबादी में ९५,००० को ही पात्र माना। अपने पक्ष में सरकार से जीआर पर जीआर निकलवाई। चार गुना एफएसआई लिया। प्रचुर मात्रा में टीडीआर लिया। स्टैंप शुल्क, प्रीमियम, विकास शुल्क, जीएसटी, सुधार शुल्क, जांच शुल्क, डिपॉजिट माफ करवाया। मेरे पास धन का रक्षा कवच है। मेरा मानना है कि गरीबों को धन देकर उनका चरित्र क्यों खराब करें? मेरी इच्छा है कि इस देश का हर एक नागरिक कार, हेलिकॉप्टर, हवाई जहाज की बजाय साइकिल व स्वूâटर पर आ जाए। इसमें किसी को निराश होने की जरूरत नहीं है। आखिर पहले मैं भी तो किसी फेरीवाले की तरह साइकिल से कपड़े बेचने घर-घर और दुकान-दुकान जाया करता था।

दो

मेरा नाम जानकर क्या करेंगे आप? मैं अनाम हूं या मेरे कई नाम और कई चेहरे हैं और मैं फिलहाल हिंदुस्थान में रहता ही नहीं हूं। लेकिन हिंदुुस्थान में वही होता है, जो मैं चाहता हूं। मैं जहां हूं खूब खुश हूं, खूब तरक्की कर रहा हूं और किसी भी बैंक के कर्ज की कोई चिंता नहीं करता। क्योंकि वो कर्ज तो बैंक वाले हिंदुस्थानियों से पच्चास-पच्चास, सौ-सौ रुपए करके वसूल ही लेंगे। आज नहीं तो कल। मुझे पता है कि हिंदुुस्थान के हमारे भाई-बहन अभी जाल्या साहब का कर्जा चुका रहे हैं, वो खत्म होते ही मेरा भी चुका देंगे। हम दोनों का कर्ज हर एक हिंदुस्थानी पर लगभग १८४ रुपए ही तो बैठता है। सिर्फ १८४ रुपए। क्या गलती है मेरी। मेरे साथ बहुत गलत हुआ है। बैंक ने दिया तो ही मैंने लिया। न देती तो मैं वैसे लेता? जो मेरी किस्मत थी, पूर्व जन्म का जितना बकाया था, उतना ही तो मैंने बैंक से लिया। जो लिया अपने हिस्से का लिया, फिर इसमें किसी की नानी क्यों मरे? बैंक की बेवकूफी की वजह से मुझे सिर्फ दस-बीस हजार करोड़ के लिए देश छोड़ना पड़ा। अगर बैंक मुझे आंख मूंदकर कुछ हजार करोड़ और ले जाने देती तो क्या बिगड़ता उसका? जैसे सत्तर वैसे अस्सी। फिर भी जो हुआ सो हुआ। मैं कहीं भी रहूंगा। अपने प्रिय देश को हमेशा याद रखूंगा। आज भी वहां मेरा सिक्का चलता है।

तीन

मैं `किंदल’ हूं। पहचाना मुझे। दुर्जन किंदल। मैं वह सब खुलेआम कर सकता हूं, जो हमारे पूर्वज एकांत में किया करते थे। मैं महिलाओं को निशा निमंत्रण देता हूं। फिर बेहद रंगीन मामला बनाता हूं। उसके बाद पुलिस, मीडिया और सिस्टम को खामोश कर देता हूं। खबर दबाने का शास्त्र सम्मत कार्य करने का विशेषज्ञ हूं। कुछ दिलजले कहते हैं कि एक युवा महिला डॉक्टर के साथ मैंने दुष्कर्म किया, जो कि एकदम झूठ है। मैं निर्दाेष हूं। मैं सिर्फ नारी कल्याण का कार्य कर रहा था, जिसे भाई लोगों ने बलात्कार का नाम दे दिया। मेरे ऊपर एक शेर खूब फिट बैठता है-
कानून बेबसों की तरह देखता रहा,
सच कत्ल हो गया मेरे झूठे बयान पर।

(लेखक तीन दशक से पत्रिकारिता में सक्रिय हैं और ११ पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)

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