लबालब आंसुओं से

लबालब आंसुओं से गमों को धोता रहा
नजदीक थे उनसे, फिर भी तन्हा रोता रहा
ऐसे वफाओं में गुम थे, मेरे अरमां,
जो पीठ पीछे वारदात को भुलाता रहा
खूब चाहा था जिसे, कभी इस दिल से
न दर्द में मोहलत, न शाम का सुकून मिला
हम हुए बिछड़े, तो वो भी है मुश्किल में…
छूना चाहा कभी ख्वाब में, तो न मिल पाएं
रौशनाई आग में वो ताप रहे माजी मेरे
न ठहर पाए, न वो पेश आए, वो दूर-दूर रहें
छोड़कर मुझे ऐसे, वो इम्तिहान लेते रहें
अब शोरगुल है जहां पर, तो रोने की खनक
मजबूर जो बैठा यहां, इक सनम के लिए
कोई ढूंढ़ लाओ उसे यहां, मेरी बेकरारी शाम है
गमजदा है ये दिल मेरा, बस उसके ही याद में
मैं भीग रहा दिल लेकर यहां, इक नई बरसात है
उसके बिन तो यह सूनी बाहें, जो आंखों में प्यास है।

– मनोज कुमार
गोण्डा, उत्तर प्रदेश

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