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खेल-खिलाड़ी: भाई तो भाई, बहना भी छाई!

संजय कुमार

देशभर में पुरुषों के साथ महिलाएं भी ग्रैंडमास्टर बनती जा रही हैं, मगर ऐसा पहली बार हुआ है, जब ग्रैंडमास्टर बनकर भाई के साथ उसकी बहन भी खड़ी हो गई है। वैशाली रमेशबाबू ने इसी महीने बीते शुक्रवार १ दिसंबर को स्पेन में फोर्थ एल लोब्रेगेट ओपन में ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल किया। इसी वर्ष शतरंज विश्वकप के एक रोमांचक फाइनल मुकाबले में दुनिया के नंबर १ शतरंज खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन से हार जानेवाल प्रगनानंद रमेशबाबू ग्रैंडमास्टर वैशाली के छोटे भाई हैं। भारत की ८४वीं ग्रैंडमास्टर बनने वाली वैशाली ग्रैंडमास्टर का खिताब हासिल करने वाली तीसरी भारतीय महिला हैं। भाई के साथ ग्रैंडमास्टर बनने पर वैशाली ने कहा, ‘यह मेरे लिए वास्तव में रोंगटे खड़े कर देने वाला क्षण है!’
शतरंज के खेल में ५ बार विश्व चैंपियन का खिताब जीतने वाले विश्वनाथन आनंद भारत के पहले ग्रैंडमास्टर हैं। यह उपलब्धि उनके खाते में १९८८ में आई। तब अपने देश में शतरंज उतना लोकप्रिय नहीं था। जब उनकी इस उपलब्धि की चर्चा भारत सहित विश्वभर में होने लगी और उनकी तस्वीरें मैग्जीन व अखबारों में छपने लगीं, तब अचानक देशभर में शतरंज के खेल के प्रति युवाओं सहित बच्चों में भी रुचि बढ़ने लगी। पिछले ३४ सालों के दौरान यह खेल पूरे देश में इतना लोकप्रिय हुआ कि वर्तमान भारत में ८४ ग्रैंडमास्टर हैं। भारत का ८४वां ग्रैंडमास्टर वैशाली बनी हैं।

ग्रैंडमास्टर, विश्व शतरंज संगठन फिडे द्वारा शतरंज खिलाड़ियों को दी जाने वाली एक उपाधि है। विश्व चैंपियन के अलावा, ग्रैंडमास्टर एक शतरंज खिलाड़ी द्वारा प्राप्त की जाने वाली सर्वोच्च उपाधि है। ग्रैंडमास्टर वैशाली के लिए २०२३ का वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है। उसने इसी वर्ष महिला ग्रैंड स्विस जीता, महिला कैंडिडेट्स २०२४ के लिए क्वॉलिफाई भी किया और अब वो इस साल के बीतते-बीतते ग्रैंडमास्टर भी बन गई हैं।

तमिलनाडु की वैशाली के पिता रमेशबाबू स्वयं शतरंज के खिलाड़ी रह चुके हैं। शतरंज के खेल में जिन उपलब्धियों को हासिल करने से वे चूक गए, उन सपनों को वह अपने बच्चों के माध्यम से पूरा होता देख रहे हैं। रमेशबाबू ने वैशाली को उनकी बहुत छोटी उम्र में ही शतरंज के खेल से परिचित करा दिया था। इस खेल को खेलते-खेलते वैशाली की इसके प्रति रुचि काफी बढ़ गई और फिर तो चेस का खेल उनका जुनून बन गया। माता-पिता और भाई की प्रेरणा से उन्होंने इस खेल को अपना करियर बनाने की ठान ली और प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगीं।

शुरुआती उपलब्धियों की बात करें तो वैशाली ने २०१२ में गर्ल्स अंडर-१२ और २०१५ में गर्ल्स अंडर-१४ के लिए लड़कियों की विश्व युवा शतरंज चैंपियनशिप जीती। २०१३ में जब वे १२ साल की थीं, तब चेन्नई में आयोजित सिमुल प्रतियोगिता में उन्होंने ग्रैंडमास्टर मैग्नस कार्लसन को हरा दिया। ये वही मैग्नस कार्लसन हैं, जिससे अगस्त २०२३ में वैशाली के भाई प्रगनानंद ने मुकाबला किया और आखिरकार उन्हें रनर-अप के खिताब से संतोष करना पड़ा।

खैर, वैशाली ने २०१६ में वुमन इंटरनेशनल मास्टर का खिताब जीता। इसी साल अक्टूबर में उन्हें भारत में दूसरा स्थान और विश्व नंबर १२, गर्ल्स अंडर १६-खिलाड़ी का दर्जा दिया गया। इसके बाद २०२० में वैशाली ऑनलाइन ओलंपियाड में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा भी बनीं। यहां भारत ने अपना पहला पदक जीता। वैशाली ने २०२१ में अपना अंतर्राष्ट्रीय मास्टर खिताब प्राप्त किया और २०२२ में ८वां फिशर मेमोरियल जीतीं। वैशाली ने टाटा स्टील चैलेंजर्स २०२३ में दोनों ग्रैंडमास्टर लुइस पाउलो सुपी और जर्गुश पेचाक को हराकर सभी को चौंका दिया। इस प्रतियोगिता में वे बारहवें स्थान पर रहीं।
२०२३ में आयोजित फिडे महिला ग्रैंड स्विस में प्रतियोगिता में वैशाली एक भी गेम नहीं हारीं और २०२४ में कनाडा में होने वाले महिला कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिए क्वॉलिफाई कर लिया। यह भी पहली बार होगा कि हम एक भाई और बहन को अप्रैल २०२४ में कैंडिडेट्स टूर्नामेंट में एक साथ खेलते हुए देखेंगे।

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