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बजट से उम्मीदें

  • विजय लोहिया

बजट बनाने वालों को पुराने तौर-तरीकों से बाहर निकलकर हकीकत के धरातल पर आना होगा व उसी हिसाब से बजट बनाना होगा। हर साल मध्यम वर्ग आयकर की सीमा बढ़ाने की मांग करता है, परंतु सीमा बढ़ती नहीं। सरकार को आयकर की छूट सीमा को भी महंगाई दर से जोड़ देना चाहिए। जितनी इंफ्लेशन रेट हो, उतनी छूट बढ़ जाए। वैसे ही ८०-डी में मिलने वाली मेडिक्लेम छूट के लिए देश के सभी हॉस्पिटल में इलाज की दरो में बढ़ोतरी होने पर छूट भी बढ़ जाए। सरकार जिस तरह दवाई के दाम निर्धारित करने में हस्तशेप करती है, उसी दर पर प्राइवेट हॉस्पिटल में बेड की दर व इलाज की अधिकतम सीमा निर्धारित कर सकती है। इसके लिए वो मेडिक्लेम कंपनियों की मदद ले सकती है। उन्होंने भी सभी छोटे-बड़े हॉस्पिटल से एग्रीमेंट कर ही रखा है। आज बड़े-२ नेताओं, अफसरों, धनाढ्य वर्ग ने किसान होने का प्रमाण पत्र ले रखा है। हम गत वर्षों में देख चुके हैं कि कई नेताओं ने अपने घर की बालकनी में फसल उगा कर आयकर छूट का लाभ उठाया। किसानों की आड़ में भ्रष्ट लोग बड़ी रकम टैक्स फ्री करने का फायदा उठाते हैं। अत: अब समय आ गया है कि एक सीमा से ज्यादा कृषि से आय को टैक्स ब्रैकेट में लाया जाए, जिससे छोटे किसानों को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा तथा व्यवस्था का फायदा गलत लोग न उठा पाएं, ऐसा भी ध्यान देने की जरूरत है। वित्त मंत्रालय को ऐसी फाइल पर नजर रख कर देश के सामने पूरे डेटा रखने चाहिए। अगर सरकार किसी भी तरह गलत फायदा लेने वालों की नकेल कसेगी तो टैक्स कलेक्शन में इजाफा होगा तथा सरकार मध्यम वर्ग को इस तरह और राहत दे सकेगी। आज की सरकार जिस तरह गरीब वर्ग का ध्यान रखती है, उसे मध्यम वर्ग का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। देश के नागरिकों में बचत के प्रति रुझान की वजह से कोरोना महामारी के बावजूद कोई आर्थिक संकट नहीं आया तो सरकार को इससे सबक लेते हुए नागरिकों को बचत के लिए प्रोत्साहित करना बहुत जरूरी है।
(लेखक भारत मर्चेंट्स चेंबर के अध्यक्ष एवं कर विशेषज्ञ हैं।)

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