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बजट राहत देनेवाला हो …आहत करनेवाला नहीं!

कन्हैयालाल घ. सराफ

बजट सरकार की आर्थिक नीति का आईना होता है। बजट सरकार की नीति व नियत का एक दस्तावेज होता है। बजट किसी भी सरकार की अर्थनीति व राजनीति का मिश्रण होता है। बजट आम जनता को राहत देनेवाला होना चाहिए, आहत करनेवाला नहीं।
बजट के माध्यम से अभावग्रस्त लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाना सरकार का प्रथम कर्तव्य है। हर आदमी पर कर्ज है। आय से ज्यादा खर्चा है। बजट आय-व्यय का लेखा-जोखा होना चाहिए न की जनता के साथ धोखा।
सरकार को काला धन बाहर लाने के लिए ‘स्वैच्छिक आय घोषणा’, बेयररबांड या विकास पत्र जैसी कोई योजना लानी चाहिए, इससे मनी लॉन्ड्रिंग कम होगी। इस प्रकार से प्राप्त धन को नई सड़कों, राष्ट्रीय महामार्गों, एक्सप्रेस-वे के निर्माण के लिए व प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए एक विशेष कोष की स्थापना कर उसका उपयोग करना चाहिए। अब तो सांस लेने तक पर वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लग चुका है। सिर्फ सार्वजानिक सुलभ शौचालयों पर ही यह कर लगना बाकी रह गया है। पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों, संगीतकारों, चित्रकारों, गायकों व खिलाड़ियों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानधन के रूप में मिलनेवाला धन आयकर मुक्त होना चाहिए। सरकार को आय के अतिरिक्त स्रोत ढूंढ़ने चाहिए। आशा है केंद्र सरकार व वित्तमंत्री बजट में वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं पर भी ध्यान देंगी, जो अपना जीवन-यापन सीमित क्षमताओं व आर्थिक संसाधनों पर व्यतीत कर रहें हैं। आज देश में केवल ६-७ प्रतिशत लोग ही आयकर देते हैं, जो सागर में बूंद के समान है।
बिजली, पेयजल, सस्ते आवास, दो वक्त की रोटी, सार्वजानिक शौचालय, अच्छी सड़कें, माना इन सब चीजों का दायित्व सरकार का है, लेकिन यदि उन्हें राजस्व ही प्राप्त नहीं होगा तो वो संसाधनों के अभाव में ये सारी सुविधाएं वैâसे दे पाएंगे? अत: हर नागरिक को अपना नैतिक कर्तव्य समझते हुए करों का भुगतान करना चाहिए। कर प्रणाली को सरल बनाने के लिए उसमें व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता है। पांच लाख रुपयों तक की व्यक्तिगत आय को आयकर से मुक्त कर देना समय की मांग है।
केंद्र सरकार की कई उदार वित्तीय नीतियां अब फल देने लगी हैं। फलदार वृक्ष पर तो पत्थर भी आएंगे ही, सरकार सावधान रहे! हमारे नगरसेवक, विधायक, सांसद, राज्यों व केंद्र सरकार के मंत्री ये सबसे बड़े ‘वित्त व निवेश’ सलाहकार हैं, जो जानते हैं कि पांच साल में अपनी पूंजी और संपत्ति को सौ गुना वैâसे किया जा सकता है। क्या नेता, क्या उद्योगपति, क्या ठेकेदार, क्या व्यापारी सभी भ्रष्टाचार की एक ही नाव पर सवार हैं। सिद्धांतों के तौलिए फटकर तार-तार हो चुके हैं। अब तो देश में पारदर्शिता केवल पेज थ्री में छपनेवाली मॉडल के वस्त्रों में बची है।
आज देश की आम जनता की हालत तो उस तोते की तरह है, जो तीखी मिर्च खाकर भी मीठा-मीठा बोलता है। वित्तमंत्री के बजट भाषण ‘एलोपैथी’ दवाओं की तरह तुरंत असरकारक होते हैं लेकिन उसके साइड इफेक्ट्स बाद में पता चलते हैं। राष्ट्रहित और जनहित चिंतन ही बजट का मुख्य मकसद होना चाहिए। सरकार के कामों पर कुछ लोग मुग्ध हैं, तो कुछ लोग क्षुब्ध हैं। सरकार चढ़ावा देखकर किसी उद्योग को बढ़ावा न दे। बजट प्रस्ताव प्रभावित करनेवाले होने चाहिए, आतंकित करनेवाले नहीं। आशा है वित्तमंत्री प्रजावत्सल, लोक कल्याणकारी बजट पेशकर अपनी सरकार के लिए लोगों की सद्भावना अर्जित करेंगी।
सुशिक्षित बेरोजगारों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। कई राज्यों की सरकारें ‘रोजगार मेला’ लगा रही हैं और आम जनता को भरमा रही हैं। वे सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों, कॉलेजों में वर्षों से रिक्त पड़े स्थानों पर नई नियुक्ति कर उसे क्यों नहीं भर रही है? कुल मिलाकर बजट संतुलित होना चाहिए। वैसे बजट का बुखार मापने का थर्मामीटर तो किसी के पास है नहीं। हां, शेयर बाजार का सूचकांक जरूर दर्शाता है कि बजट वैâसा है? बजट सुखद भविष्य का संकल्प होना चाहिए। जो भी योजनाएं व घोषणाएं बजट के अंतर्गत घोषित होती हैं, वे दीर्घकालीन होनी चाहिए।
सरकार को अगर अतीत को जीवित रखना है, भविष्य की चिंता करनी है और वर्तमान को बनाए रखना है तो बजट लोकलुभावन पेश करना चाहिए।
देश के उज्ज्वल भविष्य की एक झलक हो यह बजट। बजट रियायत देनेवाला हो, कयामत ढानेवाला नहीं। बजट हर होंठों पर हंसी और हर घरों में खुशी लानेवाला हो। बजट का सलोना रूप देखने के लिए हर कोई लालायित है। प्रत्यक्ष करों के साथ-साथ सरकार अप्रत्यक्ष करों को भी कम करे, ताकि चीजें सस्ती हों। जिस तरह स्वस्थ शरीर के लिए पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आर्थिक रूप से सेहतमंद देश को अच्छे बजट की। बजट इस तरह का होना चाहिए कि लगे शेर और बकरी एक ही घाट पर साथ-साथ पानी पी रहें हैं। बजट ऐसा हो कि खेत लहलहाएं, बेरोजगारी दूर हो, कारखानों में उत्पादन बढ़ें, महंगाई घटे, सभी जन पढ़ें और आगे बढ़ें। यदि टैक्स घटेगा तो सरकार की साख ब़ढ़ेगी। वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करनेवालों को विशेष करों में छूट दी जानी चाहिए।
बजट में देश की सुरक्षा, शिक्षा व युवा कल्याणकारी गतिविधियों और योजनाओं के लिए अलग से फंड आवंटित करना चाहिए। अतीत यूरोप का था, वर्तमान अमेरिका का है, भविष्य एशिया का होगा। एशिया में भारत सबसे विकासशील देश है। जब तक हम विश्वबाजार में प्रतियोगिता करने लायक नहीं बन जाते, तब तक ‘बजट’ से कुछ भी प्राप्ति की आशा करना चित्र में चित्रित गाय से दूध की अपेक्षा करने जैसा है। वित्तमंत्री के केवल जुबान हिलाने और बयान देने से कुछ नहीं होगा, उन्हें बजट के माध्यम से लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए ठोस कदम उठाने पड़ेंगे। विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने व अप्रवासी भारतीयों को देश की प्रगति में सहायक बनाने के लिए भी सरकार को क्रमबद्ध योजनाएं बनानी पड़ेंगी।
वित्तमंत्री को आगामी बजट में व्यक्ति की भुगतान एवं क्रय क्षमता को भी ध्यान में रखना चाहिए। झूठे वादों की कड़ाही में तले आश्वासनों के पकौड़ों से लोगों की भूख नहीं मिटती। उन्हें आपको कुछ ऐसा देना होगा, जिससे उन्हें सुखी जीवन प्राप्त हो। सरकार पूजा कम कर रही है, शंख अधिक बजा रही है। सरकार ने विकास के कई कार्य किए हैं, लेकिन उनका लाभ सही हकदार लोगों तक, अब तक नहीं पहुंचा है। माना की सभी को खुश करना वित्तमंत्री के लिए संभव नहीं होता है लेकिन जनता की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप बजट तो बनाया जा सकता है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही एक-दूसरे की खूबियों को गिना रहे हैं। एक-दूसरे की खामियों और कमियों पर पर्दा डाल रहें हैं। बता दें कि दो सांड़ों की लड़ाई में फसल उसी की खराब होती है, जिसका खेत होता है। खामियाजा तो आम जनता को ही भुगतना पड़ता है। मौजूदा सरकार व वित्तमंत्री कर घटाएं, महंगाई से मुक्ति दिलाएं।
(लेखक शिक्षाविद् व समाजसेवी हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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