मुख्यपृष्ठअपराधगड़े मुर्दे : जब गिरफ्तार हुए थे मुंबई के पुलिस कमिश्नर

गड़े मुर्दे : जब गिरफ्तार हुए थे मुंबई के पुलिस कमिश्नर

जीतेंद्र दीक्षित
मुंबई शहर की पुलिस फोर्स के मुखिया पुलिस कमिश्नर होता है। शहर में शांति बनी रहे, कानून-व्यवस्था कायम रहे, अपराध नियंत्रण में हों और अपराधों की गुत्थियां जल्द सुलझा ली जाएं इनकी अंतिम जिम्मेदारी पुलिस कमिश्नर की होती है। दुर्भाग्य से बीते २५ सालों में तीन ऐसे मौके आए हैं जब पुलिस कमिश्नर खुद कानून के शिकंजे में फंस गए और उन्हें गिरफ्तार होना पड़ा। ये कहानी पहले मामले की है जब मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर रामदेव त्यागी को बेकरी मजदूरों की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
६ दिसंबर १९९२ को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मुंबई शहर में दो चरणों में दंगे हुए थे। पहला चरण ६ दिसंबर को शुरू हुआ और हफ्तेभर तक चला। दूसरा चरण ६ जनवरी को तब शुरू हुआ जब शहर के मस्जिद बंदर इलाके में दो माथाड़ी मजदूरों की हत्या कर दी गई। दूसरे चरण के दंगों में एक समुदाय विशेष के दंगाइयों की ओर से पुलिस पर फायरिंग की भी वारदातें हुर्इं। ऐसी ही एक वारदात की खबर दक्षिण मुंबई की मिनारा मस्जिद के पास सुलेमान उस्मान बेकरी से भी आई। कंट्रोल रूम से संदेश पाकर तत्कालीन ज्वाइंट कमिश्नर (अपराध) रामदेव त्यागी एक एस.ओ.एस यानी स्पेशल ऑपरेशन स्क्वॉड के साथ मौके पर पहुंच गए। पुलिस का कहना है कि मौके पर पहुंचने के बाद भी कुछ गोलियां दागीं गई और ये अंदेशा जताया गया कि बेकरी की छत पर छिपे आतंकवादी पुलिस पर फायर कर रहे थे।
त्यागी ने अपने साथ आए कमांडो को बेकरी का दरवाजा तोड़कर अंदर घुसने का आदेश दिया। उनकी टीम बेकरी की छत पर पहुंच गई और पाया कि वहां हथियारों से लैस भीड़ मौजूद है। पुलिस के मुताबिक, भीड़ ने उस पर हमला कर दिया और कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद पुलिस ने वहां फायरिंग कर दी। भीड़ में से कई लोग इमारत के बगल में गटर के रास्ते से भाग निकले, जबकि ७८ लोगों को हिरासत में लिया गया। फायरिंग में नौ लोगों की मौत हो गई।
मुंबई दंगों की जांच के लिए जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्ण की अगुवाई में एक आयोग गठित किया गया। आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि त्यागी की ओर से बेकरी में हुआ एनकाउंटर फर्जी था। मारे गए लोग आतंकी नहीं, बल्कि बेगुनाह बेकरी मजदूर थे। त्यागी की टीम को मौके पर से कोई राइफल या आग्नेयास्त्र बरामद नहीं हुआ। पुलिसकर्मियों को छत पर मौजूद लोगों की ओर से चोट पहुंचाने की बात भी पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं मिली। आयोग ने त्यागी और उनकी टीम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की सिफारिश की।
इस बीच रामदेव त्यागी मुंबई के पुलिस कमिश्नर बना दिए गए। उसके बाद वे केंद्र में एनएसजी के महानिदेशक के पद पर नियुक्त हुए और १९९७ में रिटायर हो गए। उनके रिटायरमेंट के दो साल बाद महाराष्ट्र सरकार ने आयोग की सिफारिशों पर अमल करने के लिए एक टास्क फोर्स बनाया, जिसके मुखिया कृषिपाल रघुवंशी नाम के आईपीएस अधिकारी थे। रघुवंशी किसी वक्त त्यागी के अधीन काम कर चुके थे। कानूनी सलाह मिलने के बाद अगस्त २००२ में टास्क फोर्स ने त्यागी को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बावजूद त्यागी सलाखों के पीछे नहीं गए। उनकी तबीयत खराब होने पर उन्हें बॉम्बे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। कुछ दिनों बाद उन्हें जमानत मिल गई।
अदालत में त्यागी के खिलाफ अपराध साबित नहीं हो सका। निचली अदालत ने उन्हें डिस्चार्ज कर दिया, जिसे कि मुंबई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन दोनों ऊपरी अदालतों ने निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा।

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