मुख्यपृष्ठस्तंभगड़े मुर्दे: इंडोनेशिया के आतंकी की कहानी सजा-ए-मौत से पहले लिखी किताब

गड़े मुर्दे: इंडोनेशिया के आतंकी की कहानी सजा-ए-मौत से पहले लिखी किताब

जीतेंद्र दीक्षित

वो २०२ लोगों की हत्या करता है, फिर उन हत्याओं को जायज ठहराने के लिए एक किताब लिखता है और पकड़े जाने पर जब उसे सजा-ए-मौत दी जाती है तो कहता है- मुझे फायरिंग स्क्वॉड के सामने खड़ा करके शूट मत करना, बल्कि मेरा सिर कलम करवा देना।
इस्लामी रिवाज के मुताबिक सजा-ए-मौत देने का तरीका यही है। ये कहानी है इंडोनेशियाई आतंकवादी इमाम समुद्र की, जिसे मरने तक अपने किए का कोई पछतावा नहीं था और जिसने अपनी करतूतों को जायज ठहराने के लिए मरने से पहले एक किताब लिखी थी।
इंडोनेशिया एक इस्लामी देश है जहां दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, लेकिन इसके बावजूद यहां का समाज और यहां की सरकार बड़ी ही सहिष्णु है। दूसरे धर्म को माननेवाले अल्पसंख्यक लोगों के प्रति यहां कोई नफरत नहीं। वे शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं।
इंडोनेशिया में जगह-जगह भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रतीक नजर आते हैं। यहां की राष्ट्रीय एयरलाइंस का नाम भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर है और यहां की मुद्रा पर गणेश जी की तस्वीर छपी होती है। इंडोनेशिया में कई सारे बौद्ध धर्मस्थल भी हैं। यहां का खूबसूरत बाली प्रांत हिंदू बहुल है, जहां के निवासी बेरोक-टोक हिंदू रीति-रिवाजों का पालन
करते हैं। बाली एक बड़ा पर्यटन स्थल भी है और यहां बड़े पैमाने पर दुनियाभर से पर्यटक सैर-सपाटे के लिए आते हैं। एक तरफ यहां के समुद्र तट तमाम वॉटर स्पोट्र्स के लिए पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं तो दूसरी तरफ तमाम नाइट क्लब्स पर्यटकों की रातें गुलजार करते हैं। लेकिन साल २००२ में मजहबी जहर से संक्रमित कुछ शैतानी दिमागों ने बाली की इस खूबसूरत छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की और इंडोनेशिया को दुनिया के सामने शर्मिंदा होना पड़ा।

१२ अक्टूबर, २००२ की रात बाली के कुटा बीच के पास स्थित पैडी बार नाम के एक पब में एक आत्मघाती आतंकवादी ने विस्फोटकों से भरे बैग के साथ प्रवेश किया और नाच-गाने में मग्न पर्यटकों के बीच जाकर खुद को उड़ा लिया। २० सेवंâड बाद पास के एक दूसरे नाइट क्लब सारी क्लब के बाहर खड़ी वैन में तगड़ा विस्फोट हुआ, जिससे न केवल आसपास खड़े वाहनों के परखच्चे उड़ गए, बल्कि इलाके की इमारतों को भी बड़ा नुकसान पहुंचा। तीसरा धमाका एक मोटरसाइकिल पर लगाए बम में अमेरिकी कॉन्सूलेट के बाहर हुआ। इन धमाकों में २०२ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जबकि ढाई सौ के करीब लोग घायल हो गए। कई जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए। ज्यादातर लोगों की मौत जलने के कारण हुई। सबसे ज्यादा मौतें २० से ४० साल की उम्र के बीच के लोगों की हुई।

इन बम धमाकों के बाद अरब न्यूज चैनल अल जजीरा ने अल कायदा के तत्कालीन प्रमुख ओसामा बिन लादेन का एक वीडियो संदेश प्रसारित किया, जिसमें लादेन ये कहते हुए सुना गया कि ये धमाके अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध के बदले में किए गए हैं। साल भर पहले ही अमेरिका में ११ सितंबर, २००१ को हुए हवाई हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी मुहिम छेड़ी गई थी। जांच में ये पता चला कि इन हमलों के लिए अल-कायदा ने ३० हजार अमेरिकी डॉलर खर्च किए थे।

अपनी तहकीकात के दौरान इंडोनेशियाई पुलिस को अब्दुल अजीज नाम के एक शख्स के बारे में जानकारी मिली जो कि इमाम समुद्र के नाम से जाना जाता था। इमाम समुद्र जावा प्रांत का रहनेवाला था। १९७० में जन्मा समुद्र अपनी अकेली मां के बारह बच्चों में से एक था। २० साल की उम्र में अचानक उसने अपना घर छोड़ दिया और फिर मलेशिया के एक मदरसे में जाकर पढ़ाने लगा। ये मदरसा जेमा इस्लामिया नाम का एक कट्टरपंथी संगठन चलाता था। धमाके के कुछ हफ्तों बाद २१ नवंबर को जब वो बाली से एक मोटरबोट के जरिए सुमात्रा भाग रहा था तब पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उससे पूछताछ में ये पता चला कि आतंकी हमले वाले दिन उसने फील्ड कमांडर की भूमिका निभाई थी। तीनों ही ठिकानों पर बम धमाकों का संयोजन उसी ने किया था।

पकड़े जाने के दो साल बाद साल २००४ में उसने जेल में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखी जिसका शीर्षक बड़ा ही दिलचस्प था- आतंकवादियों के खिलाफ मैं। सभी को बड़ा अजीब लगा कि एक आतंकवादी क्यों कह रहा है कि आतंकवादियों के खिलाफ मैं, लेकिन इस सवाल का जवाब भी समुद्र ने अपनी किताब में ही दे दिया। उसके मुताबिक आतंकवादी अमेरिकी हैं। समुद्र का ये दावा था कि मारे गए लोग बेगुनाह नहीं थे, बल्कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर के ऐसे नागरिक थे, जिन्होंने मिलिट्री ट्रेनिंग ली थी। उसने अफगानिस्तान के अल-कायदा वैंâप में हुई अपनी ट्रेनिंग की जानकारी दी और कहा वो उसकी जिंदगी का सबसे खुशनुमा वक्त था।

आतंकी हमलों को जायज ठहराते हुए उसने लिखा- ‘यहूदी और ईसाई कुरान में लिखी गई बातों से मुसलमानों की तुलना में ज्यादा आश्वस्त हैं। वे इस्लामी राष्ट्रों पर इस वजह से हमला करते हैं क्योंकि वे आश्वस्त हैं कि कुरान में लिखे शब्द सच होनेवाले हैं। पैâसले के दिन तक शांति कभी नहीं आएगी।’ इमाम समुद्र की ये किताब इंडोनेशिया में बेस्ट सेलर साबित हुई और इसने लाखों डॉलर की कमाई की। उसने कहा कि किताब से हुई आमदनी उसके परिवार और उसके वकीलों को दी जाए।

अदालत में अपने खिलाफ चले मुकदमे के दौरान समुद्र ने जता दिया कि उसे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। अदालत में उसने कहा कि ये बम धमाके अमेरिका और उसके साथियों की ओर से मुसलमानों की हत्याओं का बदला लेने के लिए किए गए थे और इस्लामी सीख के मुताबिक जायज हैं। १० सितंबर, २००३ को उसे अदालत ने सजा-ए-मौत सुनाई। उसके साथ दो अन्य आतंकियों को भी मौत की सजा सुनाई गई। हालांकि, समुद्र को अपने किए का पछतावा नहीं था लेकिन उसके वकीलों ने उसकी जान बचाने के लिए अपील के तमाम विकल्प आजमाए।

२५ सितंबर, २००८ को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अंतिम अर्जी भी खारिज कर दी। ९ नवंबर, २००८ की तारीख उसे मृत्युदंड देने के लिए मुकर्रर की गई। इंडोनेशिया में मृत्युदंड फांसी के जरिए नहीं दिया जाता, बल्कि अपराधी को एक फायरिंग स्क्वॉड के सामने खड़ा किया जाता है। आंखों पर पट्टी बांधकर उसे जेल के शूटर के सामने लाया जाता है। तीन से चार शूटर उसके शरीर के अलग-अलग अंगों पर निशाना साधते हैं जैसे सिर पर, सीने पर और पेट पर। फिर एक साथ गोली चलाई जाती है और अपराधी वहीं ढेर हो जाता है। लेकिन इमाम समुद्र को मृत्युदंड का ये तरीका मंजूर नहीं था। उसने याचिका दायर की कि उसका सिर कलम किया जाना चाहिए क्योंकि इस्लाम के मुताबिक सजा-ए-मौत का यही तरीका है। उसकी याचिका खारिज हो गई और ९ नवंबर, २००८ की रात सवा बारह बजे समुद्र और उसके दोनों साथियों को नूसावंâबंगन जेल में गोलियों से भून दिया गया। गोली लगने के पहले तक समुद्र जिहादी नारे लगाता रहा।

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