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गड़े मुर्दे : जब कैमरे पर छलक गए मुंबई पुलिस कमिश्नर के आंसू

-तबादले का आदेश पाकर भी कुर्सी छोड़ने से किया इंकार

मुंबई पुलिस कमिश्नर का पद महाराष्ट्र पुलिस में डीजीपी के पद के बाद सबसे ताकतवर पद माना जाता है। महाराष्ट्र कैडर के हर आईपीएस अफसर का सपना होता है कि अपने रिटायर होने से पहले वो देश की आर्थिक राजधानी का पुलिस प्रमुख जरूर बने। मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनने से रुतबा, ताकत, संपन्नता…सबकुछ प्राप्त होता है। इस पद को पाना, लेकिन उतना आसान नहीं है। मुंबई पुलिस कमिश्नर बननेवाले शख्स को न केवल पुलिस की नौकरी में बेहतरीन प्रदर्शन करना होता है, बल्कि सत्ताधारी राजनेताओं के साथ उसके रिश्तों का अच्छा होना भी जरूरी है। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को ये भरोसा होना चाहिए कि जिसे वे पुलिस कमिश्नर बना रहे हैं, वो बेझिझक उनके हर आदेश पर अमल करेगा।
ये कहानी अबसे ठीक बीस साल पहले ३ फरवरी २००४ की है। उस दिन पहली बार मैने किसी पुलिस कमिश्नर को वैâमरे पर अपने आंसू पोंछते देखा और देखा कि सरकार के आदेश के बावजूद उन्होंने कमिश्नर की कुर्सी छोड़ने से इंकार कर दिया था। ये पहली बार था, जब मुंबई पुलिस कमिश्नर के तबादले की खबर को दिनभर राष्ट्रीय न्यूज चैनलों ने कवर किया था। ये कहानी जुड़ी है आईपीएस अधिकारी परमिंदर सिंह पसरीचा से। पसरीचा ने पुलिस महकमे में अपना करियर ज्यादातर वक्त मुंबई में ही रहकर बिताया। मुंबई कमिश्नरेट के अधीन वे डीसीपी और ज्वाइंट कमिश्नर (कानून-व्यवस्था) के पद पर काम कर चुके थे। उनकी छवि साफ-सुथरी मानी जाती थी। तेलगी घोटाले की वजह से खराब हुई मुंबई पुलिस की प्रतिमा को साफ करने के लिये नवंबर २००३ में महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने उन्हें मुंबई का पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया था। कुर्सी संभालने के ढाई महीने बाद तक मुंबई में कोई अप्रिय घटना नहीं घटी।…लेकिन ३ फरवरी को अचानक सरकार का आदेश आया कि पसरीचा की पदोन्नति डीजी रैंक पर कर दी गयी है और उनकी जगह पर अनामी रॉय को पुलिस कमिश्नर बनाया जाएगा।
पसरीचा इस आदेश से सकते में थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि सरकार ने ऐसा फैसला क्यों लिया? दरअसल, मुंबई पुलिस कमिश्नर का पद उस वक्त एडिशनल डीजी रैक का था यानी कि डीजी रैंक से एक पद नीचे। सरकार अपनी सहूलियत के मुताबिक, कमिश्नर पद का रैंक ऊपर-नीचे करती रहती है। सरकार चाहती तो उस वक्त भी पुलिस कमिश्नर पद को डीजी रैंक का घोषित करके पसरीचा को पद पर बने रहने दे सकती थी, लेकिन सरकार ने रॉय को कमिश्नर बनाने का फैसला कर लिया था। अनामी रॉय मुंबई पुलिस कमिश्नर का पदभार संभालने के लिए मुंबई पहुंच चुके थे, लेकिन पसरीचा ने कुछ ऐसा कर दिया कि सभी चौंक गए। पसरीचा ने अपनी कुर्सी छोड़ने से ही इंकार कर दिया।
ये खबर मिलते ही तमाम पत्रकार पुलिस कमिश्नर के दफ्तर पहुंच गए, लेकिन पसरीचा किसी से मिलने को तैयार न हुए और उन्होंने किसी को भी अपने केबिन में नहीं बुलाया। चैनलों पर खबर चली- ‘मुंबई पुलिस कमिश्नर का सरकार से पंगा। सरकार के आदेश के बावजूद पद छोड़ने से किया इंकार!’ पसरीचा से मेरा बतौर क्राइम रिपोर्टर पुराना परिचय था। मैं उन्हें एक एसएमएस भेजकर समझाया कि आपको अपने साथ हो रहे अन्याय की बात पर खुलकर बोलना चाहिए। सरकार आपका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही आपको हटा रही है, जबकि आप इस पद पर अब तक निर्विवाद रहे हैं। मेरी बात उनको ठीक लगी और उन्होंने मुझे इंटरव्यू देने के लिए अंदर बुला लिया। मेरे कैमरे पर बोलते-बोलते उनका गला भर आया और आंखों से आंसू छलक गए।
‘पुत्तर, सब कुछ ठीक चल रहा था। मुझसे सीएम मिले, होम मिनिस्टर मिले, सभी ने कहा कि मेरे काम से कोई शिकायत नहीं है। फिर ऐसा क्यों किया? अगर हटाना ही था तो पुलिस कमिश्नर बनाया ही क्यों?’
इंटरव्यू खत्म होते ही मैंने तुरंत उसे कमिश्नर ऑफिस के बाहर खड़ी ओबी वैन से दिल्ली भेज दिया। टीवी पर पहली बार मुंबई के पुलिस कमिश्नर भावुक होते दिखाई दिए। कमिश्नर पद को लेकर ऐसा ड्रामा कभी नहीं हुआ था। इंटरव्यू चलते ही कमिश्नर के केबिन के बाहर बड़ा हंगामा हो गया। बाकी सारे चैनल के पत्रकार चीखने-चिल्लाने लगे। पसरीचा के अकेले मुझे इंटरव्यू देने के फैसले से वे सभी भड़के थे। वे चाहते थे कि पसरीचा उन्हें भी इंटरव्यू दें और उनके कैमरे पर भी रोयें, क्योंकि मेरा चैनल उनकी रोती हुई तस्वीर एक्सक्लूसिव की पट्टी के साथ चला रहा था और दूसरे चैनल के संपादक उन्हें देखकर अपने रिपोर्टरों को डांट रहे थे।
खैर, शाम करीब ६ बजे ड्रामा खत्म हुआ। पसरीचा अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार हुए। कुर्सी न छोड़ने का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि एक वकील ने उन्हें ऐसा करने की सलाह दी थी। उस वकील का कहना था कि पसरीचा के तबादले के खिलाफ उसने एक जनहित याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर की थी और अदालत ने यथास्थिति बरकरार रखने को कहा था। अगर पसरीचा चार्ज छोड देंगे तो वो अदालत की अवमानना माना जायेगा। जब कई घंटे इंतजार के बाद भी अदालत के इस कथित आदेश की प्रति उन्हें नहीं मिली तो पसरीचा ने चार्ज छोड़कर दफ्तर से निकल जाने का फैसला किया। अगले दिन अनामी रॉय पुलिस कमिश्नर बन गए।

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