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२०५३ तक समुद्र में छोड़ा जाएगा १३३ करोड़ लीटर रेडियोएक्टिव पानी  …एक परमाणु संयत्र की त्रासदी!

२०११ में जापान में हुआ था हादसा
आमतौर पर दुनिया को आंख दिखानेवाला चीन इन दिनों जापान से डरा हुआ है। ऐसा एक परमाणु संयत्र में हुई त्रासदी के कारण हुआ है। वर्ष २०११ में जापान के उक्त परमाणु उर्जा संयत्र में हुए हादसे के बाद वहां जमा हुए करीब १३३ करोड़ लीटर रेडियो एक्टिव पानी को जापान अब समुद्र में प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके छोड़ रहा है। यह सिलसिला अगले ३० वर्षों तक यानी वर्ष २०५३ तक जारी रहेगा। रेडियोएक्टिव पानी के कारण सी फूड की गुणवत्ता प्रभावित होने और प्रभावित सी-फूड खाने वालों में रेडिएशन फैलने का डर चीन व दक्षिण कोरिया को सता रहा है।
जापान में मार्च २०११ में आए भीषण भूकंप और सुनामी से लगभग तबाह हुए फुकुशिमा दायची परमाणु संयंत्र से संशोधित रेडियोएक्टिव जल को प्रशांत महासागर में छोड़ने की प्रक्रिया गुरुवार से प्रारंभ कर दी गई। जापानी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, पहले दिन २ लाख लीटर पानी छोड़ा जाएगा उसके बाद रोजाना ४.६० लाख लीटर छोड़ा जाएगा। अगले ३० सालों तक १३३ करोड़ लीटर रेडिएक्टिव पानी समुद्र में छोड़े जाने की प्लानिंग है।
वीडियो जारी कर प्रोसेस हुआ शुरू
परमाणु संयंत्र के नियंत्रण कक्ष से एक वीडियो जारी किया गया जिसमें टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कंपनी (तेपको) के एक कर्मचारी को माउस का बटन दबा कर समुद्रीजल के पंप को चालू करते दिखाया गया। मुख्य संचालक ने कहा,‘समुद्रीजल पंप ‘ए’ चालू हो गया।’ तेपको ने बाद में पुष्टि की कि समुद्रीजल पंप को स्थानीय समयानुसार दोपहर ०१ बजकर ०३ मिनट पर चालू किया गया। तेपको ने कहा कि अतिरिक्त अपशिष्ट निकासी पंप को २० मिनट के बाद प्रारंभ किया गया। संयंत्र के अधिकारियों ने बताया कि अब तक सब कुछ निर्बाध चल रहा है।
देश-विदेश दोनों से हुआ विरोध
शोधित जल को समुद्र में छोड़ने की योजना का देश और विदेशों से काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। जापान के मछुआरा समुदाय ने इस योजना का यह कहते हुए विरोध किया था कि इससे ‘सीफूड’ का बिजनेस काफी प्रभावित होगा। चीन और दक्षिण कोरिया ने भी इस योजना पर शंका जताई थी। इसे राजनीतिक तथा राजनयिक मुद्दा बनाया था।
जापान सरकार की क्या है सफाई
जापान की सरकार तथा तेपको का कहना है कि जल को छोड़ना इसलिए आवश्यक है ताकि स्थान को सुरक्षित बनाया जा सके और दुर्घटनावश जल का रिसाव होने की किसी भी घटना को रोका जा सके। उनका कहना है कि उपचारित करने से तथा इसे पतला करने से अपशिष्ट जल अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी अधिक सुरक्षित हो जाएगा और पर्यावरण पर इसका प्रभाव नगण्य होगा। एडिलेड विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फॉर रेडिएशन रिसर्च, एजुकेशन, इनोवेशन’ के निदेशक टोनी हुकर ने कहा कि फुकुशिमा संयंत्र से छोड़ा गया पानी सुरक्षित है। उन्होंने कहा,‘यह निश्चित रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन के पेयजल दिशानिर्देशों से काफी कम है, लेकिन यह सुरक्षित है।’

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