मुख्यपृष्ठग्लैमर‘बहुत देर तक बर्दाश्त नहीं होता! : ईशा चोपड़ा

‘बहुत देर तक बर्दाश्त नहीं होता! : ईशा चोपड़ा

अपनी कलम का कमाल दिखानेवाले लेखक अभिनय नहीं करते लेकिन इस नामुमकिन कार्य को मुमकिन कर दिखाया है ईशा चोपड़ा ने। बतौर लेखिका कई शोज और फिल्में लिखनेवाली ईशा के सोनी लिव पर अभिनीत वेब शो ‘सॉल्ट सिटी’ को इन दिनों काफी पसंद किया जा रहा है। पेश है, ईशा चोपड़ा से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

  • वेब शो ‘सॉल्ट सिटी’ स्वीकारने की क्या वजह रही?
    सबसे पहले तो मुझे शो ‘सॉल्ट सिटी’ का नाम बहुत पसंद आया। शो को स्वीकारने से पहले मैंने यह कल्पना की थी ‘सॉल्ट सिटी’ यानी नमकीन शहर। मुंबई प्रसिद्ध है चारों ओर फैले अरब सागर की वजह से। समुद्र का पानी खारा होता है और यही मुंबई की पहचान भी है। भिन्न-भिन्न धर्मों के लोग जब लोकल ट्रेनों में एक साथ सफर करते हैं तो किसे क्या पता कि किसका धर्म क्या है? विविधता में एकता वाले इस शहर की कहानी जब मेरे सामने आई तो मैंने इसे करना चाहा।
  • क्या किरदार है आपका?
    इस शो में भी मेरा नाम ईशा है। एक पुरुष प्रधान परिवार में ईशा की आवाज हमेशा दबी रहती है। लेकिन एक दिन अपने आप में खोई-खोई और गुमशुम रहनेवाली ईशा के साथ कुछ ऐसा घटित होता है कि उसकी दबी आवाज बाहर निकलती है। कहीं-न-कहीं कहानी यह बताती है इंसान फिर चाहे वो पुरुष हो या स्त्री बहुत देर तक अन्याय बर्दाश्त नहीं कर पाता और अंतत: वो बोलने लगता है।
  • इस किरदार के लिए आपने कैसी तैयारी की?
    मुझे किसी भी किरदार के लिए होमवर्क या तैयारी करने की आदत नहीं है। मैं स्पॉनटेनिटी पर विश्वास करती हूं। आईने में देखकर संवाद बोलती हूं तो इस बात का मुझे अंदाजा हो जाता है कि मैं किस तरह रिएक्ट हो रही हूं। इससे मुझे काफी सुविधा हो जाती है। मैं खुद को होमवर्क कर रिपीट नहीं करना चाहती।
  • आपके पैरेंट्स डॉक्टर हैं, फिर मेडिकल फील्ड छोड़कर अभिनय में कैसे आना हुआ?
    मेरे पिता नामचीन डॉक्टर और मां एक्सपोर्टर हैं। डैड ने चाहा था कि मैं मेडिकल फील्ड में ही अपना करियर बनाऊं। मम्मी-डैडी दोनों लगातार १६ घंटे सीरियसली काम करते रहते हैं। मैंने डैड से कहा, अगर १६ घंटे गर्दन झुकाए ही काम करना है तो व्हाय नॉट हैव सम फन इन करियर? मैं अपने करियर में सीरियसली काम नहीं करना चाहती थी। मुझे अभिनय के मौके खुद-ब-खुद मिले और मैंने मेडिकल को गुडबाय कर दिया।
  • अभिनय और राइटिंग दोनों अलग पहलू हैं। ये कैसे संभव हुआ?
    मेरे पैरेंट्स बहुत बुद्धिमान हैं और अपने फील्ड के स्टार हैं। उनकी कुछ तो प्रतिभा मुझमें आई होगी। मुझमें राइटिंग की क्षमता है इसका अहसास मुझे तब हुआ जब मुझे एडवर्टाइजिंग में जॉब मिली। मेरी राइटिंग में क्रिस्प है ये मुझे रिस्पॉन्स मिला। यहीं से शुरुआत हुई। ‘आउट ऑफ लव’ इस टीवी शो का स्क्रीन प्ले मैंने हाल ही में लिखा। ‘असुर’ वेब शोज का पूरा कॉन्टेंट मैंने लिखा, ‘बंदी युद्ध की’ शो की मैंने राइटिंग की, विद्या बालन अभिनीत फिल्म को भी लिखा। लेकिन लेखक अपनी फिल्म का प्रमोशन रिलीज से पहले नहीं करते। वैसे भी लेखक रोशनी में कम ही आते हैं।
  • बतौर अभिनेत्री आपके काम पर लेखक हावी होगा, आपको कभी ऐसा नहीं लगा?
    मैंने अभिनय और कलम को अलग रखा है। अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ कि मेरे लेखक होने से मुझे परफॉर्म करने का मौका नहीं मिला। आखिर दोनों अलग दिशाओं वाला काम है। जब मैं एक्टिंग करती हूं तो अंडर प्ले करती हूं। यह सोचकर कि अगर लेखक ने इसे लिखा होगा तो उसके मन में क्या सोच होगी? एक मर्तबा एक एक्टिंग कोच ने मेरी तारीफ की थी यह कहकर की मैं एक अच्छी अदाकारा हूं, मेरे लिए यह प्रमाणपत्र काफी है।

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