मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : कारपेंटरी पृथ्वी पर पहला यांत्रिक उद्योग!

अर्थार्थ : कारपेंटरी पृथ्वी पर पहला यांत्रिक उद्योग!

पी. जायसवाल।  कोरोना के बाद इकोनॉमी फिर से रीस्टार्ट मोड में है। श्रमिक एवं कारीगर बड़ी संख्या में अपने मूल स्थानों पर जा चुके हैं। उसमें से बहुत से युवा एवं उद्यमी अब उद्यम एवं रोजगार को विकल्प के रूप में सोच रहे हैं। आज चर्चा करते हैं एक ऐसे उद्योग की, जो इस पृथ्वी का पहला यांत्रिक उद्योग है और इस कोरोना के बाद ग्रामीण व कस्बे स्तर पर सबसे अधिक संभावनाएं लिए हुए है लेकिन अभी तक औपचारिक दृष्टि से अछूता है, जबकि विदेशों में बाकायदा इसके लिए संस्थान हैं, वह है कारपेंटरी उद्योग। सभ्यता की शुरुआत से ही जब समूहों में रहना प्रारंभ हुआ और लोग घरों में रहना प्रारंभ किए तभी से लकड़ियों के विभिन्न प्रयोगों के रूप विकसित हुए और कारपेंटरी उद्योग की शुरुआत हुई। सभ्यता का पहला आविष्कार है पहिया, तो सभ्यता की शुरुआत में जो यह आविष्कार हुआ वह फर्नीचर उद्योग का एक उदाहरण है, जबकि इतने हजारों साल के अस्तित्व से लेकर आज तक भारत में इसका कोई भी औपचारिक संस्थान नहीं है सिवाय प्रयागराज में एक कारपेंटरी इंस्टीट्यूट के। जबकि अन्य यंत्र ज्ञान के आपको शिक्षण संस्थान मिल जाएंगे, लेकिन वह यंत्र शिक्षा जिसने हमारे जीवन, विकास और सभ्यता को आधार दिया उसका औपचारिक होना अभी बाकी है।
आज भी देश में सबसे पुराना और प्रमाणिक यंत्र प्रयोग वाला कुटीर उद्योग कारपेंटरी उद्योग ही है। आपको भारत के हर गांवों में एक कारपेंटर मिल जाएगा, जो अपना कारपेंटर कारखाना चला रहा होगा। थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो कस्बे में आपको १० से १२ मिल जाएंगे। थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो जिले में २० से २५ मिल जाएंगे और जब बड़े शहरों में बढ़ेंगे तो सैकड़ों मिल जाएंगे। इतने बड़े कुटीर उद्योग का जाल होने पर भी आज यह कौशल या तो पिता द्वारा पुत्र को या उस्ताद द्वारा अपने चेले के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। इस यंत्र चालित मानवीय सभ्यता के सबसे पुराने उद्यम को अगर थोड़ा पॉलिश किया जाए तो बड़े पैमाने पर रोजगार एवं इनके आय में वैल्यू एडिशन किया जा सकता है। आज भी महानगरों में किसी भी कार्यालय या घरों के इंटीरियर के काम में आत्मा इन्हीं कारपेंटर की रहती है लेकिन इसकी सारी मलाई इंटीरियर डेकोरेटर ले जाता है, जबकि वह सारा काम कारपेंटर एवं इसके एलायड उद्यम ही करते हैं। इसके एलायड उद्यम में इलेक्ट्रीशियन के लिए इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का कोर्स है, पेंटिंग के लिए कुछ पेंट कंपनियों ने औपचारिक शिक्षा भी शुरू की है, लेकिन कारपेंटर के लिए कोई शिक्षण संस्थान नहीं है, जबकि इंटीरियर एवं फर्नीचर उद्योग का यह मूल आधार है।
अमेरिका और यूरोप ने इस प्राचीन यंत्र ज्ञान एवं उद्योग की महत्ता को पहचाना है और बाकायदा इसके लिए कारपेंटरी इंस्टीट्यूट हैं। अब जरूरत है भारत में इस कौशल और यंत्र चालित उद्यम के लिए औपचारिक शिक्षण संस्थान चालू करने की क्योंकि मौजूदा कुशल कारीगरों के अलावा बड़े पैमाने पर नवयुवा हैं, जो रोजगार के लिए खड़े हैं। यदि हम आज ही इस पर एक ठोस नीति बनाकर एक कारपेंटर संस्थान की परिकल्पना को साकार करते हैं, तो सिर्फ हम मौजूदा स्किल को एक सूत्र में पिरोकर इनका पलायन ही नहीं रोकेंगे, बल्कि बड़े पैमाने पर नव युवाओं को कारपेंटर उद्यम, एक रोजगार अवसर एवं स्व उद्यमशीलता के रूप में विकल्प मिलेगा।
इसके लिए सबसे पहले हमें कारपेंटरी ज्ञान को एक इंजीनियरिंग ज्ञान एवं शिक्षा के रूप में रेखांकित करना पड़ेगा। जब तक हम इसे इंजीनियरिंग ज्ञान एवं शिक्षा के रूप में रेखांकित नहीं करेंगे, हम अपना दृष्टिकोण इसके उत्थान के लिए बदल नहीं सकते। फिर इसे एक औपचारिक उद्योग के रूप में चिह्नित करना होगा क्योंकि पूरे देश में सबसे बड़े और प्राचीन कुटीर उद्योग के विस्तृत नेटवर्क के रूप में यही है। ऐसा कोई गांव नहीं जहां आपको माइक्रो स्तर का कारपेंटर नहीं मिले। अत: इसे हमें रोजगार के सबसे सुलभ प्राकृतिक अवसर के रूप में चिह्नित करना होगा। इसे औपचारिक रूप देने हेतु हमें इनके कौशल ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर सर्टिफिकेट डिप्लोमा या डिग्री आधारित शिक्षा लानी पड़ेगी। इसके लिए कारपेंटरी ज्ञान एवं रोजगार की उपयोगिता को देखते हुए एक समर्पित संस्थान खोला जाना चाहिए। दरअसल, कारपेंटरी ज्ञान एक प्रकार का इंजीनियरिंग ज्ञान है एवं रोजगार में इसकी तीव्र उपयोगिता को देखते हुए एक समर्पित संस्थान खोला ही जाना चाहिए, जो कक्षा १२वीं के बाद ही इस कोर्स के प्रति रोजगार एवं आय की संभावनाओं को देखते हुए युवाओं को आकर्षित करे। इस डिग्री की शिक्षा के अलावा सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स को डेवलपमेंट मिशन पॉलिटेक्निक या आईटीआई से संबद्ध कारपेंटरी इंस्टीट्यूट के माध्यम से दिया जा सकता है। इसकी रूपरेखा में विश्वविद्यालय या एआईसीटीई के तहत कारपेंटरी डिग्री कोर्स को डिजाइन किया जाना चाहिए, जिसमें कारपेंटरी एवं इसके सहायक विषयों का समावेश हो। इस डिग्री कोर्स हेतु बाकायदे एक कारपेंटरी इंस्टीट्यूट भी खोला जाए। कारपेंटरी इंस्टीट्यूट के अलावा इस कोर्स को मौजूदा इंजीनियरिंग पाठयक्रम में भी शामिल कर इसे इंजीनियरिंग कॉलेज में भी इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल की तरह एक विभाग माना जाए और वहां भी इसकी शिक्षा दी जाए। इस कोर्स को इंटीरियर डिजाइनिंग कोर्स से स्वतंत्र रखा जाए क्योंकि एक कारपेंटर तो इंटीरियर डिजाइनर बन सकता है लेकिन एक इंटीरियर डिजाइनर कारपेंटर नहीं बनता है। इस डिग्री की शिक्षा के अलावा सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण भारत सरकार के स्किल डेवलपमेंट मिशन द्वारा किया जाए, जिसमें कारपेंटरी एवं इसके सहायक विषयों का समावेश हो। इस बात का ध्यान रखते हुए कि यह ज्ञान देश में पैâले ऐसे करोड़ों उद्यमियों को देना है, जो पहले से ही इस कार्य को कर रहे हैं। बस थोड़े से हेल्प और पॉलिश ज्ञान से एक बड़ा वैल्यू एडिशन करना है। भारत सरकार की पहले से एक योजना इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्किल (आईआईएसडी) है, वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार कारपेंटरी एवं अलायड हुनर इसके कोर्स में नहीं है। इसी इंस्टीट्यूट में कारपेंटरी एवं अलायड का कोर्स पहले शामिल किया जाए। कोर्स में शामिल करने के पश्चात विकेंद्रीकृत कारपेंटर इंस्टीट्यूट को इससे संबद्ध कर खोला जाए। प्रवासी निवासी एवं अन्य इच्छुक अभ्यर्थी निम्न आय वर्ग वाले होंगे। अत: इनका प्रदेश के अन्य हिस्सों से आकर पढ़ना संभव नहीं होगा। अत: इसे विकेंद्रीकृत केंद्रों के माध्यम से संबद्ध कर चलाया जाए। इस कोर्स को त्वरित लाभ से भी जोड़ा जाए और सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स को तो सिर्फ उन्हें ही दिए जाएं जो पहले से ही इस लाइन में हों और यह उन्हें एक औपचारिक डाटाबेस में लाने के लिए एक प्रक्रिया की योजना के तहत हो। इन त्वरित लाभों में सर्टिफिकेट/डिप्लोमा/डिग्री लेने के बाद इनमें से जो स्वरोजगार अपनाना चाहते हैं, उन्हें इंस्टीट्यूट से निकलते वक्त ही उद्योग आधार दिया जाए, उन्हें एमएसएमई का सर्टिफिकेट तुरंत दिया जाए, उन्हें प्राथमिक ऋण दिए जाएं। कोर्स की शर्तों से संबद्ध जो भी कारीगर स्वरोजगार करना चाहें उन्हें तत्काल १ लाख रुपए औजार और मशीनरी हेतु एवं ५० हजार रुपए कार्यशील पूंजी के रूप में दिए जाएं, ताकि वह स्वरोजगार कर सकें, इसे क्रेडिट गारंटी सीजीटीएसएमई योजना के तहत दिया जाए। इसकी निगरानी व्यवस्था भी रखी जाए। जो बड़े पैमाने पर करना चाहते हों उन्हें सीजीटीएसएमई सुविधा वाला प्रतिभूति रहित प्रोजेक्ट ऋण क्रेडिट गारंटी योजना के तहत दिया जाए। इसकी निगरानी व्यवस्था भी रखी जाए, ताकि यह बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों द्वारा सुनिश्चित हो। यदि हम ऐसा कर ले जाते हैं, तो समझ जाइए कि कुटीर उद्योग को नियमित करने में एक बड़ा कदम होगा। विश्वकर्मा श्रम सम्मान के माध्यम से यदि इसका विस्तार पूरे भारत में हो तो माइक्रो इकोनॉमी मजबूत होकर भारत के मैक्रो एवं सनातन अर्थशास्त्र दोनों को मजबूत करेगी।
(लेखक अर्थशास्त्र के वरिष्ठ लेखक एवं आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों के विश्लेषक हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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