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जातिगत जनगणना के मुद्दे की धार भोथरी करने का दांव…जनगणना की सेल्फ सर्विस

शिवप्रताप / मुंबई। देश के नागरिकों के लिए अब जनगणना की स्व-गणना यानी सेल्फ सर्विस की सुविधा दी गई है। भारत सरकार ने शुक्रवार देर रात जनगणना (संशोधन) नियम, २०२२ जारी किए, जिसके तहत यदि देश के नागरिक चाहें तो आगामी जनगणना में ऑनलाइन माध्यमों के जरिए जानकारी प्रदान कर सकते हैं। इस दौरान वे पेपर और इलेक्ट्रॉनिक दोनों ही माध्यमों से जानकारी प्रदान कर सकेंगे। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में १० ‘जनगणना संचालन निदेशक’ नियुक्त कर दिए। इन अधिकारियों को सिक्किम, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गुजरात (दमन दीव और दादरा और नगर हवेली), तमिलनाडु (पुडुचेरी) और भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त के कार्यालय (ओआरजीआई) में नियुक्त किया गया है। हालांकि सरकार ने अभी तक जनगणना शुरू करने की नई तारीखों का एलान नहीं किया है।
संशोधित नियमों के अनुसार घर-घर जाकर जनगणना संबंधी जानकारी हासिल करने की कवायद पहले की तरह ही जारी रहेगी। ज्ञात हो कि घर-घर जाकर जानकारी एकत्र करने और एनपीआर को अद्यतन करने की कवायद १ अप्रैल से ३० सितंबर २०२० के बीच पूरी की जानी थी, लेकिन कोविड-१९ महामारी पैâलने के बाद इसे स्थगित कर दिया गया।
अब जबकि जनगणना में नागरिकों को सेल्फ सर्विस की सुविधा दी गई है, राजनीति के जानकार इसे २०२४ में होनेवाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। दरअसल पांच राज्यों में संपन्न हालिया विधानसभा चुनाव में जाति जनगणना का मुद्दा, खासकर उत्तर प्रदेश में जोर-शोर से उठा था। हालांकि यह मुद्दा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में ज्यादा असर नहीं दिखा पाया और भाजपा को वहां प्रचंड जीत मिली, लेकिन इस जीत के बाद भी भाजपा का थिंक टैंक चिंतित है, क्योंकि भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले जहां ५५ से ज्यादा सीटों का नुकसान हुआ है, वहीं उसका वोट प्रतिशत केवल १.६३ फीसदी ही बढ़ा है। डबल इंजन की सरकार होने के बूते भाजपा थिंक टैंक का आंकलन चुनाव में ३०० के आंकड़ों को पार करना था। ऐसे में भाजपा थिंक टैंक जाति जनगणना को गंभीरता से ले रहा है। क्योंकि लोकसभा चुनाव में इसके फिर से सिर उठाने की संभावना प्रबल है। ऐसे में गृह मंत्रालय ने जनगणना की स्व-गणना का दांव खेल दिया है ताकि इस मुद्दे की धार को भोथरा किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के जमाने में भारत में लोगों को जातियों के हिसाब से गिना जाता था। आखिरी बार १९३१ में जाति जनगणना हुई थी। हालांकि १९४१ में भी जाति जनगणना हुई, लेकिन जाति आधारित सूची बनाने में देरी हुई। इस बीच देश आजाद हो जाने के कारण ये आंकड़े प्रकाशित नहीं किए गए। भारत में पहली जनगणना १९५१ में हुई थी। तब आम लोगों के साथ-साथ केवल अनुुसूचित जातियों और जनजातियों को ही अलग से गिना गया। चूंकि भाजपा थिंक टैंक हमेशा चुनावी मोड में होता है, इसलिए जानकारों का कहना है कि यदि लोकसभा चुनाव में जाति जनगणना का मुद्दा जोर पकड़ता है, तो ऑनलाइन सुविधा यानी जनगणना की स्व-गणना का हवाला देकर उसे ठंडा किया जा सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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