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 एलओसी के सटे गांव में जश्न! … 19 सालों के बाद तारबंदी से बंटे गांव में शादी की खुशियां

सुरेश एस. डुग्गर
जम्मू, 24 अगस्त। कश्मीर में एलओसी से सटे सिलीकोट गांव में पिछले दो दिनों से जश्न का माहौल है। माहौल भी धूम धड़ाके वाला है। हो भी क्यों न। एलओसी पर दोनों मुल्कों और दोनों सेनाओं के बीच 19 साल से जारी सीजफायर के अरसे में यह पहला मौका था कि कोई शादी-ब्याह यूं धूम-धड़ाके के साथ मनाया गया हो।

सिलीकोट गांव उस हाजीपीर एरिया में आता है, जहां के बच्चों का बचपन सिर्फ उन गोलियों को ही गिनते हुए बीता है जो उस पार से बरसाई जाती रही हैं या फिर इस गांव के लोगों ने अपनों को गोलियों व बमों का शिकार होते हुए देखा है।

पर गरकोट का मुद्दस्सर अहमद ख्वाजा खुशनसीब था जो अपनी बारात लेकर इस गांव में आया था और अपने सपनों की रानी को ब्याह कर ले गया। यह ब्याह कल रात को संपन्न हुआ।
सिलीकोट गांव की भी दर्दभरी गाथा है। आधा गांव तारबंदी के कारण बंट गया तो पाक गोलों की बरसात के चलते कुछ साल पहले गांववासी लगमा और सलामाबाद में आकर बस गए। पर यह पहली शादी थी 19 साल के अरसे में जो सिलीकोट में ही संपन्न हुई थी।

दुल्हे के शब्दों में: ‘बचपन से ही मैने इस इलाके में गोलों और गोलियों की आवाज के बीच मौत का तांडव देखा है। पर अब मैं जबकि अपनी शादी के लिए इस गांव में आया हूं, खुशी के मारे मेरे आंसू नहीं थम रहे हैं।’ ख्वाजा के बकौल, अगर सीजफायर न होता तो आज मैं भी इस खुशी से वंचित रह जाता और गांववाले इतने धूम-धड़ाके के साथ शादी संपन्न नहीं करवा पाते।

उसकी इस खुशी में भारतीय सेना भी शामिल हुई थी जिसने तारबंदी में लगे उस गेट पर उसकी बारात का स्वागत किया था जो सिलीकोट को बांटती थी। हालांकि दूल्हे के पिता मुहम्मद्दीन ख्वाजा दुआ करते थे कि एलओसी पर यूं ही शांति का माहौल बना रहे ताकि वे सिलीकोट में अपनों से मिलने बेरोकटोक आते जाते रहें। जबकि दुल्हन के अब्बाजान मुहम्मद अकरम चलकू के बकौल, उन्हें याद ही नहीं है कि उनके गांव में ऐसा शादी का माहौल कब बना था क्योंकि एलओसी पर दोनों पक्षों में होनेवाली गोलाबारी ने उनकी खुशियां छीन ली थीं जो अब सीजफायर के कारण पुनः वापस लौट आई हैं।

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