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द्रास-कारगिल में जश्न!  72 दिनों बाद यहां के निवासियों को मिले ताजे फल-सब्जियां 

सुरेश एस डुग्गर : जम्मू । करीब तीन महीनों के बाद दुनिया के सबसे ठंडे माने जाने वाले और देश के साइबेरिया अर्थात द्रास के इलाके के लोगों के लिए वह सच में बेहद खुशी का पल था जब वे करीब तीन महीनों के बाद ताजा सब्जियां और फल लेने के लिए बाजारों में निकले थे।
दरअसल लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के इन दोनों इलाकों को दुनिया से मिलाने वाली सड़क 72 दिनों के उपरांत खुली तो कश्मीर ताजा फलों व सब्जियों के काफिले यहां तक पहुंचे थे। इतना जरूर था कि अतीत में 5 से 6 महीनों तक अक्सर बंद रहनेवाले 434 किमी लंबे श्रीनगर-लेह राजमार्ग को इस बार 72 दिनों के बाद ही खोल दिया गया था! इसके कई कारणों में दो प्रमुख कारण कम बर्फबारी का होना तथा चीन सीमा पर बने हुए तनाव से निपटने में आनेवाली हर रूकावट को जल्द दूर करने का दबाव था।
इस राजमार्ग के चार-छह महीनों तक बंद होने से लाखों लोगों का संपर्क शेष विश्व से कट जाता है और ऐसे में उनकी हिम्मत काबिल-ए-तारीफ है।  बात उन लोगों की हो रही है जो इस राजमार्ग के बंद हो जाने पर कम से कम 6 माह तक जिन्दगी बंद कमरों में इसलिए काटते हैं क्योंकि पूरे विश्व से उनका संपर्क कट जाता है।
इतना जरूर था कि प्रत्येक सर्दियों में बर्फबारी के कारण बंद रहने के कारण लेह के लोग इतने प्रभावित नहीं होते हैं क्योंकि वहां दिल्ली से आने वाली उड़ानें इनकी आपूर्ति करती रहती थीं। पर द्रास व करगिल के लोग किस्मत के धनी नहीं होते।
जब कल शाम को कश्मीर से चलने वाला वाहनों का काफिला द्रास व करगिल में जरूरी खाद्यान लेकर पहुंचा तो बाजारों में लोग लाइनों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। उन्हें ताजा फल व सब्जियां 72 दिनों के उपरांत उपलब्ध हुए थे।
एक करगिलवासी का कहना था कि उसने तीन महीनों के बाद ताजा सब्जी के दर्शन किए हैं और उसकी चिंता अगले महने से शुरू होने जा रहे रमजान के महीने की भी थी कि अगर यह राजमार्ग समय से पहले न खुलता तो उनकी मुश्किलें बढ़ जातीं। वे सीमा सड़क संगठन अर्थात बीआरओ का तहेदिल से शुक्रिया अदा जरूर करते थे जिनके अथक प्रयासें से यह संभव हो पाया था।
काबिले सलाम सिर्फ बीआरओ के कर्मी ही नहीं बल्कि इस राजमार्ग के साल में कम से कम 6 महीनों तक बंद रहने के कारण शेष विश्व से कटे रहने वाले द्रास, लेह और करगिल के नागरिक भी हैं। इन इलाकांे में रहने वालों के लिए साल  में छह महीने ऐसे होते हैं जब उनकी जिन्दगी बोझ बन कर रह जाती है। असल में छह महीने यहां के लोग न तो घरों से निकलते हैं और न ही कोई कामकाज कर पाते हैं। जमा पूंजी खर्च करते हुए पेट भरते हैं। चारों तरफ बर्फ के पहाड़ों के बीच लद्दाख के लोगों को अक्तूबर से मई तक के लिए खाने पीने की चीजों के अलावा रोजमर्रा की दूसरी चीजें भी पहले ही एकत्र कर रखनी पड़ती हैं।

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