मुख्यपृष्ठसंपादकीयमुफ्त अनाज की ‘जंजीर’

मुफ्त अनाज की ‘जंजीर’

देश की जनसंख्या १३० करोड़ के आसपास है और उसमें ८१.३५ करोड़ गरीब जनता को और पांच वर्षों तक मुफ्त अनाज देने का फैसला मोदी मंत्रिमंडल ने किया है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अनाज योजना को और पांच वर्षों तक विस्तार देने का यह फैसला है। इस योजना के तहत हर व्यक्ति को हर माह पांच किलो अनाज मुफ्त दिया जाता है। इस योजना पर केंद्र सरकार के ही ११ लाख ८० हजार रुपए खर्च होंगे, इस तरह की जानकारी सरकार की ओर से दी गई है। सरकारी तिजोरी का पैसा देश के गरीबों के लिए खर्च किए जाने पर किसी को आपत्ति होने का कारण नहीं, लेकिन गरीबों को और कितने समय तक गरीब ही रखेंगे? गरीबों को और कितने दिन सरकारी मुफ्त अनाज पर गुजारा करना है? ये असली सवाल है। फिर तुम नौ सालों से जिस वित्तीय प्रगति का गप्पा हांक रहे हो उसका क्या हुआ? यदि तुम्हारी सरकार रफ्तार से वित्तीय प्रगति कर रही है, तो तुम्हें गरीबों को हर महीने मुफ्त अनाज देने का वक्त क्यों आ रहा है? एक तरफ यह कहना कि बीते पांच सालों में साढ़े तेरह करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए और उसी समय ८१ करोड़ लोगों के लिए मुफ्त अनाज योजना को विस्तार दिया जाता है। एक तरफ ‘ट्रिलियन’ अर्थव्यवस्था पर गप्पा और दूसरी तरफ ८१ करोड़ जनता को मुफ्त अनाज देने की लीपापोती! बीते नौ सालों से ऐसे ही जुमलेबाजी शुरू है। ८१.३५ करोड़ जनता को मुफ्त में अनाज देकर उनका चूल्हा जलाना पड़ता है, इसका मतलब वर्ष २०१४ से गरीबों को आखिर मिला क्या? केवल पांच किलो मुफ्त अनाज! गरीब तो गरीब ही रहे और भाजपा के खजाने में सैकड़ों करोड़ जमा हुए, वो भी बेहिसाब। देश की आधे से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। और वो सरकार की ओर से दिए मुफ्त अनाज के सहारे जी रही है। यह आत्मनिर्भरता का लक्षण नहीं। गरीब मतदाताओं को गुलाम बनाने का यह दांव-पेच है। प्रधानमंत्री मोदी खुद को महाशक्ति, विश्वगुरु जैसी उपाधि से नवाजते, लेकिन उनके देश की आधी जनता भूखी सो रही है और सरकार की रेवड़ी पर गुजारा कर रही है। इस देश में विधायक-सांसदों को ५०-५० करोड़ रुपए देकर खरीदा जाता है लेकिन गरीबों के मुंह पर पांच किलो अनाज मारा जाता है। और स्पष्ट कहें तो, जिन्हें चुनकर लाए, वे ५०-५० करोड़ में बिकते हैं और जो चुनकर लाते हैं वे ५-५ किलो अनाज के बदले मत ‘दान’ करते हैं। यह अपने देश और लोकतंत्र का दुखद अंत है। अडानी जैसे मोदी मित्रों की प्रॉपर्टी हजारों गुना बढ़ती है, लेकिन ८० करोड़ जनता को सरकारी भीख पर जीना पड़ता है। किसानों की आय दोगुनी करने के लिए मोदी ने वादा किया था लेकिन डबल रहा बगल में। संपन्न, मेहनती किसानों पर अब राशन की दुकानों पर ५ किलो राशन के लिए कतार में खड़े रहने की नौबत मोदी राज में आई है। किसानों को खेती-बारी नहीं और युवाओं को रोजगार नहीं। वर्ष में दो करोड़ लोगों को रोजगार देंगे, ऐसा मोदी बोलते थे, लेकिन नोटबंदी जैसे फैसलों से अर्थव्यवस्था चरमरा गई, वहीं नौकरियां भी चली गर्इं। लोग हमारे गुलाम रहें और लोग हमारी मेहरबानी पर जिएं ऐसा सरकार चाहती है। मोदी सरकार के कार्यकाल में न महंगाई कम हुई, न बेरोजगारी। न सामान्य जनता की आय बढ़ी, न जोर-शोर से कहे गए १५ लाख रुपए आम जनता के खातों में जमा हुए। अब २०२४ का लोकसभा चुनाव सिर पर है और उसमें सत्ता पक्ष के सिर पर यह उल्टे लदेगा यह निश्चित है। इसलिए एक तरफ ‘ट्रिलियन-फिलियन’ अर्थव्यवस्था के रंगीन सपने दिखाना और दूसरी तरफ ८१ करोड़ जनता को मुफ्त अनाज की ‘जंजीर’ में जकड़ने का उद्योग शुरू है। लेकिन यह ८१ करोड़ जनता इस जंजीर को तोड़े बगैर नहीं रहेगी, इसे सत्ताधारी ध्यान रखें।

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