मुख्यपृष्ठनए समाचारइंटरनेशनल बॉर्डर पर पाक रेंजरों की गैरहाजिरी में आरंभ हुआ चमलियाल मेला

इंटरनेशनल बॉर्डर पर पाक रेंजरों की गैरहाजिरी में आरंभ हुआ चमलियाल मेला

  • सीमा पर इस बार भी नहीं बंटेगा ‘शक्कर’ और ‘शर्बत’

सुरेश एस डुग्गर / जम्मू

चमलियाल सीमा चौकी पर स्थित बीएसएफ के अधिकारियों द्वारा बाबा चमलियाल की दरगाह पर तड़के चादर चढ़ाने के साथ ही मेले का आगाज तो हुआ पर देर रात तक पाक रेंजरों द्वारा इसमें शिरकत करने के न्यौते को स्वीकार न किए जाने के कारण उनकी उपस्थिति इस बार न होने का ही परिणाम होगा कि लगातार पांचवें साल पाकिस्तानी जनता बाबा के ‘शक्कर’ व ‘शर्बत’ के प्रसाद से मरहूम रहेगी।
बता दें कि रामगढ़ सेक्टर में चमलियाल पोस्ट पर आज आयोजित मेले में इस बार भी लगातार ५वीं बार दोनों मुल्कों के बीच ‘शक्कर’ और ‘शर्बत’ के बंटने की उम्मीद कम ही है। कारण स्पष्ट है। अभी तक पाक रेंजरों ने इसकी बाबत बुलाई गई बैठक में शिरकत करने के बीएसएफ के न्यौते का भी कोई जवाब नहीं दिया। वर्ष २०२० और २०२१ में कोरोना के कारण इस मेले को रद्द कर दिया गया था और वर्ष २०१८ व २०१९ में पाक रेंजरों ने न ही इस मेले में शिरकत की थी और न ही प्रसाद के रूप में ‘शक्कर’ और `शर्बत’ को स्वीकारा था क्योंकि वर्ष २०१८ में १३ जून के दिन पाक रेंजरों ने इसी सीमा चौकी पर हमला कर चार भारतीय जवानों को शहीद कर दिया था तथा पांच अन्य को जख्मी। तब भारतीय पक्ष ने गुस्से में आकर पाक रेंजरों को इस मेले के लिए न्यौता नहीं दिया था। पर अबकी बार वे इसका जवाब ही नहीं दे रहे हैं। नतीजतन यही लगता है कि देश के बंटवारे के बाद से चली आ रही परंपरा इस बार भी टूट जाएगी। वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है कि यह परंपरा टूटने जा रही हो बल्कि अतीत में भी पाक गोलाबारी के कारण कई बार यह परंपरा टूट चुकी है।
नतीजतन इस बार भी परंपराओं पर राजनीति के साथ-साथ सीमा के तनाव का भयानक साया पड़ गया है। यही कारण है कि पिछले लगभग ७० सालों से पाकिस्तानी श्रद्धालु जिस `शक्कर’ तथा `शर्बत’ को भारत से लेकर अपनी मनौतियों के पूरा होने की दुआ मांगते आए हैं इस बार उन्हें ये दोनों नसीब नहीं हो पाएंगे। और यह भी पक्का हो गया है कि सीमा पर पाक रेंजरों के अड़ियलपन के कारण यह परंपरा जीवित नहीं रह पाएगी।
यह कथा है उस मेले की जो देश के बंटवारे से पूर्व ही से चला आ रहा है। देश के बंटवारे के उपरांत पाकिस्तानी जनता उस दरगाह को मानती रही जो भारत के हिस्से में आ गई।
यह दरगाह जम्मू सीमा पर रामगढ़ सेक्टर में चमलियाल सीमा चौकी पर स्थित है। इस दरगाह मात्र की झलक पाने तथा सीमा के इस ओर से पाकिस्तान भेजे जानेवाले `शक्कर’ व `शर्बत’ की दो लाख लोगों को प्रतीक्षा होती है। हालांकि बीच में दो-तीन साल उन्हें यह प्राप्त नहीं हो पाए थे।
चमलियाल सीमा चौकी पर बाबा दलीप सिंह मन्हास की दरगाह है। उसके आसपास की मिट्टी को ‘शक्कर’ के नाम से पुकारा जाता है तो पास में स्थित एक कुएं के पानी को `शर्बत’ के नाम से। जीरो लाइन पर स्थित इस चौकी पर जो मजार है वह बाबा की समाधि है जिसके बारे में यह प्रचलित है कि उनके एक शिष्य को एक बार चंबल नामक चर्म रोग हो गया था और बाबा ने उसे इस स्थान पर स्थित एक विशेष कुएं से पानी तथा मिट्टी का लेप शरीर पर लगाने को दिया था। जिसके प्रयोग से शिष्य ने रोग से मुक्ति पा ली थी। इसके बाद बाबा की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो गांव के किसी व्यक्ति ने उनकी गला काट कर हत्या कर डाली। बाद में हत्या वाले स्थान पर उनकी समाधि बनाई गई। प्रचलित कथा कितनी पुरानी है यह जानकारी नहीं है। मेले का एक अन्य मुख्य आकर्षण भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा ट्रालियों व टैंकरों में भरकर ‘शक्कर’ व ‘शर्बत’ को पाक जनता के लिए भिजवाना होता है। इस कार्य में दोनों देशों के सुरक्षा बलों के अतिरिक्त दोनों देशों के ट्रैक्टर भी शामिल होते हैं और पाक जनता की मांग के मुताबिक उन्हें प्रसाद की आपूर्ति की जाती रही है जिसके अबकी बार संपन्न होने की कोई उम्मीद नहीं है।

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