" /> कम्युनिस्ट-कम्युनिस्ट: भाई-भाई… विचारधारा का भाई`चारा’!

कम्युनिस्ट-कम्युनिस्ट: भाई-भाई… विचारधारा का भाई`चारा’!

जिसकी कारगुजारियों से दुनिया परेशान हो, उसमें नेपाल की वर्तमान सत्ता को कमाल की काबिलियत दिखती है। जो देश दुनिया में अपने कुकृत्यों के लिए बदनाम हो, उसमें नेपाल की कम्युनिस्ट सत्ता को गजब का कौशल दिखता है। जो मुल्क विश्व में अपनी बदनीयती के लिए मशहूर हो, उसमें नेपाल की क्रांतिकारी सत्ता को आला दर्जे की ईमानदारी दिखती है। जो राष्ट्र ब्रम्हांड में अपनी अनैतिकता के लिए कुख्यात हो, उसमें नेपाल की ‘पारखी’ सत्ता को अव्वल दर्जे की नैतिकता दिखती है। लिहाजा, आज दुनिया बेसब्री से उस चश्मे को खोज रही है, जिससे नेपाल की ओली सरकार को न केवल चीन की कुटिल कुटनीति की खूबियां नजर आती हैं, बल्कि उसे धूर्त चीन दुनिया के लिए ‘प्रेरणा की नई पाठशाला’ भी लगता है। ओली सरकार यह तर्क देकर कि चीन ने आज उपलब्धियों के जो पहाड़ खड़े किए हैं और विकास के जो आयाम रचे हैं, उन पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए; अपनी चीनी चापलूसी पर तो पर्दा डाल सकती है पर दोनों की अवसरवादी हकीकतों को झुठला नहीं सकती।
चीन की तरफ बढ़ते झुकाव और आंतरिक राजनीति में चीनी दखल के बीच ओली सरकार का तर्क है, ‘वो अब सही रास्ते पर है और उसने गलती सुधार ली है। संतुलित और राष्ट्रीय हित के संबंधों के लिए वो भारत और चीन के साथ सहयोग व साझेदारी को जरूरी मानती है। वो किसी के रिश्ते को बढ़ावा या अनदेखा नहीं कर सकती। अपने राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर दोनों के साथ सहयोग बढ़ाने व एकतरफा निर्भरता को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उसने कनेक्टिविटी को `विविधता’ देने के मकसद से चीन के साथ परिवहन समझौते किए हैं, ताकि वो बहुआयामी कनेक्टिविटी का हिस्सा बन सके और उसके पास अधिक विकल्प हों। वो एकतरफा ढलान को सही कर रही है। नेपाल ने अब चीन को जो अहमयित दी है, वो वास्तव में उसे पहले से ही देनी चाहिए थी…’ नेपाल ने अपनी नई ‘झोली’ नीति की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति कर ली है।
अलबत्ता, यह नीति ओली सरकार के इस दूसरे कार्यकाल की दिमागी उपज नहीं है, असल में २०१६ के अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी थी। अपनी हिंदुस्थान यात्रा पर आने से पहले ही ओली ने चाइना कार्ड खेला था। अर्थात चीन से समान संबंध व एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में नेपाल में आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के लिए बातचीत आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था। तब ओली के स्वदेश लौटने के बाद भी उनकी सरकार का रुख चीन के प्रति नरम और हिंदुस्थान के प्रति गरम वाला ही रहा था। नतीजे में राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की प्रस्तावित भारत यात्रा को रद्द कर दिया गया था और भारत स्थित नेपाली राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को यह कहकर वापस बुला लिया गया कि वे उनकी सरकार को अपदस्थ करने में हिंदुस्थान की मदद कर रहे थे।
ओली का ‘वो’ छलावा
अपने पहले कार्यकाल के दौरान फरवरी, २०१६ में ओली बतौर प्रधानमंत्री ६ दिवसीय हिंदुस्थान यात्रा पर आए थे। इस दौरान उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विदेश मंत्री एवं गृह मंत्री समेत उपराष्ट्रपति से भी मुलाकात की थी। तब उनकी यात्रा का घोषित उद्देश्य ही था दोनों देशों में आए तनाव को खत्म करना, जो २०१५ के संविधान संशोधन के बाद उपजे मधेशी आंदोलन से खड़ा हुआ था। हिंदुस्थान यात्रा की समाप्ति पर तमाम द्विपक्षीय मुद्दों पर विमर्श के बाद उन्होंने दावा किया था कि अब दोनों देशों के बीच व्याप्त तनाव पूरी तरह खत्म हो गए। अपनी यात्रा में बड़ी सफलता के तौर पर वे विनाशकारी भूकंप के बाद नेपाल के पुनर्निर्माण के लिए हिंदुस्थान द्वारा घोषित एक बिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता के क्रियान्वयन का निर्णय लेकर जा रहे थे। उस वक्त भारत ने नेपाल में ढांचागत सुविधाओं के विकास के लिए एक बिलियन डॉलर की अतिरिक्त वित्तीय सहायता की घोषणा को भी दोहराया था। लिहाजा, उस यात्रा में ओली ने नीतिगत व ढांचागत सहयोग के ७ विभिन्न समझौते भी किए थे। जिनमें नेपाल-बांग्लादेश के बीच आवागमन के लिए भारत होकर पारगमन की सुविधा देने, नेपाल के व्यापार के लिए भारत के विशाखापट्टनम पोर्ट की सुविधा और वहां तक भारतीय रेल की सुविधा देने, भारत के मुजफ्फरपुर से नेपाल के धारकेबर के बीच विद्युत लाइन क्षमता बढ़ाने, नेपाल के तराई क्षेत्र में ५१८ किमी लंबी सड़कें बनाने व नेपाल में ५० हजार घरों के निर्माण के समझौतों के अतिरिक्त भारत द्वारा घोषित वित्तीय सहायता के अंतर्गत २५० मिलियन डॉलर की पहली किस्त के उपयोग पर समझौते प्रमुख थे। तब मान लिया गया था कि प्रधानमंत्री ओली की यात्रा दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव को कम करने के साथ-साथ विकास की साझेदारी को पुन: पटरी पर लाने में सहायक सिद्ध हुई थी, परंतु हिंदुस्थान का वो आकलन गलत था। ओली के मन में कुछ और ही पक रहा था। कुछ-कुछ वैसा ही जब २०१९ में भारत यात्रा करके सीधे नेपाल पहुंचे चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के मन में पक रहा था।
सच्चाई हकीकत से कोसों दूर
नेपाल की ओली सरकार पर उस समय भी चीन का नशा सवार था और आज भी सवार है। अब नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ही खुल्लमखुल्ला मानते हैं कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएन (माओवादी) और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच भाईचारा है। इसलिए, दोनों देश पिछले कुछ समय से अनुभवों का आदान-प्रदान कर रहे हैं और एक-दूसरे की अच्छी परंपराओं और सफलताओं से सीख रहे हैं। वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को मित्र मानते हैं। दावा करते हैं कि चीनी क्रांति से सीखने के लिए कई सकारात्मक चीजें हैं। आज, चीन ने अभूतपूर्व प्रगति की है। यह दुनिया के समाजवादियों के लिए एक प्रेरणा हो सकती है और उन्हें उनके अनुभव से सीखना होगा। हालांकि, वे यह दावा भी करते हैं कि नेपाल चीनी क्रांति की नकल नहीं कर रहा है, न ही चीनी समाजवादी मॉडल का बिल्कुल पालन कर रहा है पर हकीकत उनके दावों से कोसों दूर है। आज नेपाल वही सब कर रहा है जो चीन करता आया है। आज नेपाल खुद के लैंडलॉक होने का रोना रोकर उत्पादन और परिवहन में २० प्रतिशत अधिक भुगतान की जो लाचारी गिना रहा है, बांग्लादेश की तुलना में १०० डॉलर के उत्पादन की कीमत १२० डॉलर होने की जो वजहें बता रहा है; वे दरअसल बिल्कुल बेतुकी हैं, क्योंकि चीनी परिवहन सुविधाओं की विविधता न तो उसके लैंडलॉक स्टेटस को अनलॉक करती हैं, न ही उसे किसी पोर्ट सिटी तक एक्सेस ही देती हैं। जबकि हिंदुस्थान से पारगमन के जरिए बांग्लादेश और सीधे विशाखापट्टनम तक व्यापार का एक्सेस देनेवाला समझौता खुद ओली अपने पहले कार्यकाल में कर चुके थे। असल में नेपाल के कुछ सत्ताधारी चीन के सत्ताधारियों से इतने मंत्रमुग्ध हैं कि वे तमाम आरोपों को दरकिनार कर तर्क देने लगते हैं कि वो चीन की सफलता के अनुभव से सीखने की कोशिश कर रहे हैं। आज नेपाल चीन के जिस शासन, खासतौर पर शी जिनपिंग की कार्यशैली और विकास का मुरीद बना हुआ है और उसे चीन का जो विकास समकालीन इतिहास का चमत्कार नजर आ रहा है, उसके पर्दे के पीछे झांके बिना ही वो उसकी राह पर चलने को बैचेन है। क्यों? तो इसमें सत्ता की फौरी राहत जो है।
सियासी दिवालिएपन…
अंधभक्त ओली सरकार जब यह मानने को तैयार नहीं होती कि उनकी पार्टी में जरूरत से ज्यादा चीनी दखल है, जब उसे राजदूत यांग्की के हस्तक्षेप में कोई दोष ही नजर नहीं आता, बल्कि वो आंखें मूंदे यह मानकर निश्चिंत हो जाती है कि चीन की ‘घोषित’ नीति ही है कि वो दूसरों के आंतरिक मामलों में कभी हस्तक्षेप नहीं करता; तब नेपाल के इस सियासी दिवालिएपन पर तरस आता है। ओली सरकार को जब विकासशील देशों का चीन के साथ विश्वास और सहयोग नजर आता है, उसे छोटे और विकासशील देशों के लिए चीनी वकालत की पहल दिखती है; तब कॉमरेड ओली में किसी विदेशी राजदूत की प्रेरणा साफ नजर आती हैं। जब मामला संविधान संशोधन विधेयकों के मसौदे का हो, विदेश नीति के रणनीतिकारों को प्रभावित करने का हो, सरकार की रणनीति से कूटनीति तक दखल का हो और ओली को इसमें कुछ गैर नजर नहीं आता; तब उनकी नीयत की खोट उजागर हो जाती। आज नेपाल को कोरोना महामारी पर काबू पाने में भी चीनी खूबी दिखती हो तो इसे उसकी सत्ता का वैचारिक दिवालियापन मान लेना चाहिए। कोई संप्रभु देश जब यही नहीं समझ पाता कि जब कई विकसित देश भी अभी कोरोना से जूझ रहे हैं तो चीन ने दो महीने के भीतर ही उस पर काबू वैâसे पा लिया, तो उसकी सियासी सौदेबाजी का खुलासा हो जाता है। आज नेपाल को चीन के मामले में थोड़े अध्ययन की जरूरत है। खुद की सत्ताधारी पार्टी को चीन के हाथों लीज पर देने, न देने का पैâसला उसका निजी निर्णय हो सकता है। वह उसकी इच्छा पर है, यह जिम्मा वो जिसे चाहे दे पर यह कहना कि चीन दूसरों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता; नेपाल को जरा नजर उठाकर बगल में पाकिस्तान के हालात को देख लेना चाहिए। यह कहना कि वो छोटे और विकासशील देशों की वकालत करता है, उसे श्रीलंका, मालदीव, जिबुती, किर्गिस्तान, लाओस, मंगोलिया, मोन्टेनेग्रो, पाकिस्तान और तजाकिस्तान के मामले उठाकर देख लेने चाहिए। आज नेपाल को चीन में अच्छाइयां ही अच्छाइयां नजर आ रही हैं और उसके मत से अच्छी बातें कहीं से भी सीखी जा सकती हैं। यही अच्छी बातें कभी श्रीलंका ने भी सीखने का प्रयास किया था, बदले में उसे फीस के तौर पर हंबनटोटा पोर्ट देना पड़ा। यही अच्छी बातें कभी अप्रâीकी देशों ने भी सीखने का प्रयास किया था बदले में उन्हें फीस के तौर पर जिबूती पोर्ट देना पड़ा। इसलिए किसी को कोई ऐतराज नहीं है कि नेपाल जितनी चाहे ‘अच्छी बातें’ चीन से सीखें, बशर्ते दूसरों को सलाह न दे।
चीन ने काफी कम समय में पूरी दुनिया में सफलता के झंडे गाड़े हैं यह शोध लगाने वाली ओली सरकार को यह खोज भी लगा लेनी चाहिए कि उसकी इस सफलता की कब्र में कितने अपराध दफ्न हैं। यह सच है कि दुनिया में सफलता मायने रखती है पर सभ्य समाज में सफलता अर्जित करने के माध्यम उससे ज्यादा मायने रखते हैं। यह जगजाहिर है कि नेपाल के ताजे-ताजे चहेते चीन ने अपनी कथित सफलता में जायज कम और नाजायज रास्ते ज्यादा अख्तियार किए हैं। इसलिए बेशक नेपाल चीन की गोद में बैठकर ज्ञान की घुट्टी पिए और उसे अपना गुरु स्थान भी मान ले पर कम-से-कम वो चीन से सीख लेने की सलाह दूसरों को न ही दे तो बेहतर होगा। (क्रमश:)