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मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का महाराष्ट्र की जनता से भावनात्मक संवाद “मैं मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार!” …कहा कुल्हाड़ी का डंडा ही पेड़ का काल, जन्मदात्री शिवसेना पर उसी के डंडे से प्रहार मत करो

सामना संवाददाता / मुंबई
मेरे लोगों को मैं मुख्यमंत्री नहीं चाहिए होऊंगा तो क्या किया जाए? परंतु सूरत में जाकर बोलने की बजाय मेरे सामने आकर एक को तो कहना चाहिए! मैं तुरंत मुख्यमंत्री पद छोड़ दूंगा। मैं अपना इस्तीफा भी तैयार करके रख रहा हूं। अब मैं ‘वर्षा’ की बजाय ‘मातोश्री’ में रहने जा रहा हूं।
‘कुल्हाड़ी का डंडा पेड़ का काल’ इस कहावत की याद इस मौके पर उद्धव ठाकरे ने दिलाई। उन्होंने कहा, ‘कुल्हाड़ी का डंडा ही पेड़ का काल बनता है।’ फिलहाल यही अवस्था हो गई है। ऐसी कहावत सभी जानते होंगे। परंतु कहानी कई लोग नहीं जानते होंगे। एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काट रहा था। कुल्हाड़ी से प्रहार कर रहा था। पेड़ पर रहनेवाले पक्षी घबरा गए। हमारा आसरा रहा यह पेड़ अब टूट जाएगा। धराशायी होकर गिर पड़ेगा, परंतु उससे भी ज्यादा प्रहार से पेड़ को कितनी वेदना हो रही होगी? इसलिए वे पक्षी पेड़ से बोलने लगे। उन पक्षियों ने पेड़ से कहा, ‘दादा, तुम पर ये प्रहार पड़ रहा है। तुम्हें कितना कष्ट हो रहा होगा न? दर्द हो रहा होगा न। इस पर वह पेड़ बोला, घाव लग रहा है इसलिए मुझे पीड़ा नहीं हो रही है। यह लकड़हारा जिस कुल्हाड़ी से प्रहार कर रहा है, उस कुल्हाड़ी के हत्थे की लकड़ी मेरे ही डाल की लकड़ी है। इसकी वेदना मुझे अधिक हो रही है।’ इस कहानी का उदाहरण देने के दौरान उद्धव ठाकरे ने, ‘शिवसेना राजनीति में हमारी जन्मदात्री है। उस पर उसी का डंडा इस्तेमाल करके कोई प्रहार न करे।’ ऐसा आह्वान किया।
इस्तीफे का पत्र देता हूं, आप ही राज्यपाल के पास ले जाएं!
सामने आएं तो मुख्यमंत्री पद के इस्तीफे का पत्र तैयार करके आपके हाथ में दे दूंगा, आप ही उसे राज्यपाल को दे दें। ऐसा इस मौके पर उद्धव ठाकरे ने लापता हुए विधायकों से कहा। जो विधायक लापता हैं अथवा जिन्हें गायब किया गया है वे आएं और मेरा इस्तीफा लेकर राज्यपाल के पास जाएं। मैं नहीं जा सकता क्योंकि मुझे कोविड हो गया है। परंतु राज्यपाल ने मुझे खुद बुलाया तो मैं भी आने को तैयार हूं। यह किसी तरह की बहानेबाजी नहीं है। बेबसी का मामला नहीं है और मजबूरी तो बिल्कुल भी नहीं है। आज तक ऐसी कई चुनौतियों का हम सामना कर चुके हैं। क्या होगा ज्यादा-से-ज्यादा? सत्ता जाएगी न! फिर लड़ेंगे। जब तक मेरे साथ शिवसेनाप्रमुख द्वारा जोड़कर दिए गए सभी शिवसैनिक हैं। तब तक मैं किसी भी संकट से नहीं डरता। मैं चुनौतियों का सामना करनेवाला व्यक्ति हूं, उसे पीठ दिखानेवाला नहीं।’
अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होता होगा तो प्रसन्नता ही होगी

उद्धव ठाकरे ने आगे कहा कि मैं मुख्यमंत्री और पक्षप्रमुख ऐसे दोनों पद छोड़ने को तैयार हूं। मैं मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद यदि शिवसेना का मुख्यमंत्री बनता होगा तो मुझे सहर्ष मंजूर है। सिर्फ मैं मुख्यमंत्री नहीं चाहिए दूसरा कोई भी चलेगा, ऐसा कहते होगे तो वह भी मंजूर है, परंतु सामने आकर कहो।
शिवसेनापक्षप्रमुख का पद भी छोड़ूंगा सिर्फ शिवसैनिक कहें
मैं शिवसैनिकों से आह्वान करता हूं, ऐसा कहकर उद्धव ठाकरे ने कहा कि यह बालासाहेब की शिवसेना नहीं रह गई है, ऐसा आरोप लगाया जा रहा है। ऐसा आरोप लगानेवालों के लिए मेरे पास भी जवाब है। जिन शिवसैनिकों को लगता होगा कि मैं शिवसेना का नेतृत्व करने के लायक नहीं हूं, वे मुझसे कहें। मैं शिवसेनापक्षप्रमुख का पद भी छोड़ने को तैयार हूं, परंतु यह कहनेवाला विरोधी नहीं होना चाहिए अन्यथा ऐसे फालतू बहुत हैं। उनके कहने पर अथवा उनके ट्रेडिंग, ट्रोलिंग, ट्विटर-पीटर से मैं बंधा नहीं हूं। मैं शिवसैनिकों से बंधा हूं। वे भी इस पचड़े में नहीं पड़नेवाले। वह फेस-टू-फेस। संकट का सामना करनेवाला शिवसैनिक है, वही कहें।

जनता का प्रेम ही मेरे जीवन की कमाई है
मुख्यमंत्री की हैसियत से आपसे प्रेम करनेवाला राज्य की जनता से बोलते समय उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘भाइयों और बहनो! पद आते हैं और जाते हैं। जीवन की कमाई क्या है? ये पद नहीं हैं। पद पर बैठने के बाद आप काम करते हो। उस पर जनता की क्या प्रतिक्रिया होती है, वही आपकी कमाई है। ढाई साल में आपने मुझे प्रेम दिया। कहां हुई हमारी मुलाकात? जिनसे जान-पहचान नहीं। कहीं दूर-दराज रहते हैं। मुंबई में रहते होंगे तब भी मुलाकात का संयोग आया होगा, ऐसी भी बात नहीं है। परंतु इसी माध्यम से मैं आपसे बोलता आया हूं। कई लोग मुझसे कहते हैं, ‘उद्धव जी जब आप बोलते हैं तब मुझे हमारे परिवार का एक व्यक्ति बात कर रहा है, ऐसा लगता है।’ इससे ज्यादा और सौभाग्य क्या होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता। ऐसा उद्धव ठाकरे ने कहा।

अविश्वास प्रस्ताव दायर करने की नौबत न आए!
उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘मुख्यमंत्री का पद मेरे पास इच्छा के विरुद्ध आया। अभी भी मैं उससे चिटककर नहीं बैठ रहा हूं। अभी आप कहोगे तो उतरने को तैयार हूं। यह मेरी नौटंकी नहीं है। संख्या कितनी किसके पास है यह विषय मेरे लिए गौण है, परंतु अंतत: यह लोकतंत्र है उसमें, जिसके पास अधिक है वह जीतता है। फिर संख्या आप प्यार से जुटाते हो या जोर-जबरदस्ती से, डरा-धमकाकर जुटाते हो यह नगण्य है। परंतु सामने खड़ा करने के बाद सिर गिने जाते हैं और अविश्वास प्रस्ताव मंजूर या नामंजूर होता है। मैं जिन्हें अपना मानता हूं, उनमें से कितने वहां गए। कितने मेरे खिलाफ मतदान करेंगे इसका विचार मैं नहीं करता। एक ने भी यदि मेरे खिलाफ मतदान किया तो वह मेरे लिए शर्म की बात होगी। मेरे खिलाफ उन्हें अविश्वास प्रस्ताव दाखिल करने की नौबत न आए इसलिए वे मुझसे कहें। मैं कहीं भी उन नामों का खुलासा नहीं करूंगा। मैं मेरा मन मजबूत करके बैठा हूं। मुख्यमंत्री के पद पर रहने की मेरी इच्छा नहीं है, परंतु आगे जब-जब हमारी मुलाकात होगी उस समय हमारा प्रेम ऐसा ही बरकरार रखें, इतना ही निवेदन है।

मुख्यमंत्री मिलते नहीं हैं, यह मुद्दा सही है।

मुख्यमंत्री किसी से मुलाकात नहीं करते हैं, इस आरोप पर बोलते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि पिछले कई दिनों से मीडिया के माध्यम से यह मुद्दा अपने सामने आ रहा है। क्या यह बालासाहेब की शिवसेना है? शिवसेना ने हिंदुत्व छोड़ दिया है क्या? शिवसेना को सही मायने में कौन चलाता है? मुख्यमंत्री मिलते नहीं हैं, यह मुद्दा सही है। मैं मुलाकात नहीं करता था क्योंकि मेरा ऑपरेशन हुआ था। इसके बाद दो-तीन महीने मैं किसी से मुलाकात नहीं कर सका, यह सही बात है लेकिन मैं मिला नहीं तो काम नहीं होता था, ऐसा नहीं है। मैंने अपनी कैबिनेट की पहली मीटिंग अस्पताल के बगल के कमरे से ऑनलाइन की थी, उसके बाद से अब तक काम शुरू है।

मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार, कोई भी एक आकर बोले
अगर किसी को लगता है कि मुख्यमंत्री न बनूं, लोगों को लगता है कि मैं मुख्यमंत्री पद के लिए अयोग्य हूं तो आगे आकर साफ-साफ कहे, मैं इसी क्षण मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हूं। अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुझे कोई एतराज नहीं है। केवल अविश्वास प्रस्ताव की नौबत न आए।

मेरा कोई स्वार्थ नहीं था
मैं इच्छा की अपेक्षा जिद्दीपन से काम करनेवाला व्यक्ति हूं। कोई अनुभव नहीं था। २०१९ में मजबूरन हमें अलग रास्ता स्वीकार करना पड़ा। उस समय शरद पवार ने कहा था कि यह जिम्मेदारी आपको स्वीकार करनी होगी। पवार साहेब और सोनिया जी का आग्रह था, मेरा कोई स्वार्थ नहीं था।

तुम्हें जो मिला है, वह साहेब के बाद शिवसेना ने दिया है, यह याद रखो
बालासाहेब २०१२ में गए। २०१४ में हम अकेले लड़े थे। तब भी हम हिंदू थे। अब भी हिंदू हैं और आगे भी रहेंगे। मुद्दा भी यही रहने वाला है। विचार भी यही रहनेवाला है। २०१४ में शिवसेना, जो अपने अकेले दम पर लड़ी थी। प्रतिकूल परिस्थिति में भी ६३ विधायक चुनकर आए थे और उसी से वे मंत्री बने। बालासाहेब के बाद की शिवसेना थी, यह कृपया ध्यान रखें। पिछले ढाई वर्ष से मैं खुद मुख्यमंत्री हूं, मेरे साथ पहले और वर्तमान वैâबिनेट सहयोगी बालासाहेब के सेना के सहयोगी भी हैं।

यह लोकतंत्र बालासाहेब को नहीं जमनेवाला
कल-परसों विधान परिषद का चुनाव हुआ, उससे पहले मैं होटल में गया। सभी अपने विधायक थे। मैं वहां गया, मैंने कहा यह कौन-सी परिस्थिति, यह कौन-सा लोकतंत्र, जिसे मैं अपना मानता हूं, शिवसैनिक परिश्रम करते हैं। जनता शिवसेना के विचारों पर विश्वास करके चुनकर देती है और इन लोगों को हमें ही इकट्ठा करके रखना पड़ता है। ये कहां गए देखो, वो कहां गए देखो, बाथरूम जाने पर भी संदेह। शंका ठीक है, लेकिन लघुशंका जाने पर भी शंका, यह कौन-सा लोकतंत्र? ऐसा लोकतंत्र मुझे जमने वाला नहीं और बालासाहेब को भी तथा आपको भी जमने वाला नहीं है।

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