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देश की राजधानी में सुरक्षित नहीं हैं बच्चे

योगेश कुमार सोनी
हाल ही में दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीसीआर) ने एक रिपोर्ट फाइल की है, जिसमें बच्चों के गायब होने के आंकडे दर्शाए गए हैं। राष्ट्रीय राजधानी में हर दिन लगभग १७ बच्चे लापता हो जाते हैं और उनमें से २ का पता नहीं चल पाता है। यह रिपोर्ट २००८ और २०१७ के बीच दिल्ली पुलिस के आंकड़ों पर उनके अध्ययन पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन १० वर्षों में ६४,३५७ बच्चे लापता हुए, जिनमें से ९,३८३ का पता नहीं चल पाया है। दरअसल, बच्चे चोरी गैंग की सक्रियता लगातार बढ़ती जा रही है और यह दंश दिल्लीवासी लगातार झेल रहे हैं। पार्क, गली व बाजारों से बच्चे गायब होने का सिलसिला बीते कई वर्षों से जारी है। दरअसल, इस मामले को लेकर पुलिस अपनी अहम भूमिका निभाती है, लेकिन थोड़ा समय बीतने पर बच्चे शहर से पार करवा दिए जाते हैं, जिससे उनका मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है। इस बात में कोई दो राय नही हैं कि पुलिस अधिकतर केस अच्छे से निपटा लेती है और उनको सफलता मिल जाती है लेकिन कुछ केसों में असफलता हाथ लगने का विशेष कारण यह होता है कि बच्चा किसी जानकार या रिश्तेदार ने ही गायब किया होता है और उस स्थिति में बच्चे को मार तक भी दिया जाता है। यदि पुलिस को शक हुआ और मामले की गंभीरता से जांच हुई तो आरोपी पकड़ा जाता है, अन्यथा इस तरह केसों में निराशा ही हाथ लगती है। हमारे पास इस मामले को समझने के दो नजरिए है। पहला तो हम व्यवस्था के खिलाफ नाराज होकर शासन-प्रशासन को दोषी मानकर उस पर गुस्सा निकालें जो बेहद स्वाभाविक है। लेकिन वहीं दूसरी ओर हम अपने बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा स्वयं लें और उनको सुरक्षित रखें। दरअसल, कुछ लोग मानवता के विरुद्ध जाकर शॉर्टकट पैसा कमाना चाहते हैं। जिसके लिए जो बच्चे चोरी किए जाते हैं उन्हें संबंधित क्षेत्र से कहीं बहुत दूर बेच दिया जाता है। गौर किया जाए तो जाए तो जो रेड लाइट पर जो बच्चे भीख मांगते हैं आखिर वे कौन होते हैं? ये अधिकतर वे ही बच्चे होते हैं, जो चोरी किए हुए होते हैं। यह गिरोह बेहद पॉवरफुल होता है, यह लोग इलाके बांटकर अपना पाइंट बनाते हैं, जहां यह भीख मंगवाते हैं। इसके अलावा कम उम्र की बच्चियों को या तो चुराया जाता है या गरीबी के चलते खरीद लिया जाता है, जिनसे तमाम तरह के गलत काम करवाए जाते हैं। बच्चे चोरी केस में एक बात यह भी गौर करने वाली है कि अधिकतर बच्चे गरीब व मध्यम वर्ग परिवारों के चोरी होते हैं। इसके पीछे का कारण यह भी है कि ऐसे गिरोह रेकी करके कांड करते हैं। उदाहरण के तौर पर सरकारी स्कूल के बच्चे अपने घर से पैदल जाते हैं और वहीं से गायब हो जाते हैं। शिकायत पर पुलिस काम तो करती है, लेकिन जितनी संजीदगी से वह किसी पूंजीपति व सत्ताधारी के केस में अपना बेहतर काम करती है, उतना किसी गरीब के लिए नहीं। दिल्ली में एक आंगनबाड़ी में काम करनेवाली महिला गरीब बच्चों को सरकार से दी हुई सामग्री वितरण करती और बच्चों से अपना प्रेमभाव बढ़ाकर उनको अपनी ओर आकर्षित करती थी, लेकिन उसकी हकीकत सामने आते ही सब बेहद आश्चर्यचकित हो गए। उसने गिरोह से मिलकर बच्चा गायब कर हरिद्वार बेच दिया। पुलिस कार्यवाही के दौरान उस महिला ने बताया कि वह उन्हीं बच्चों को चुराती थी जिनके माता-पिता दोनों काम करते हैं और वह पुलिस के पास जाने में भी ज्यादा सक्षम नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की पुलिस द्वारा पकड़े गए एक गैंग ने बताया कि वह बच्चा चुराकर आगे दे देते हैं उन्हें पांच हजार से पचास हजार रुपए तक मिलते हैं और वह गैंग उस बच्चे की किडनी व अन्य अंगों को लाखों में बेच देते हैं। हालांकि, ऐसे किस्से बहुत आम हैं लेकिन यहां शासन-प्रशासन की पूर्णत: विफलता इसलिए ज्यादा दिखती है कि चोरी के साथ मानव अंगों की तस्करी भी देश में जोरों पर चल रही है।

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