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चीन की रणनीति सलामी स्लायसिंग के द्वारा … भाजपा/आरएसएस ने समुदायों को बांटा

डॉ. सुषमा गजापुरे `सुदिव’
इन दिनों राजनीति के भीतरी और बाहरी समीकरण बड़ी तेजी के साथ बदल रहे हैं। पलक झपकते ही एक नया समीकरण सामने आ जाता है। विकास के नाम पर जनता के अधिकारों को छीनकर उसे कर्तव्यों की दुहाई दी जा रही है। आज उन नीतियों और व्यवस्थाओं पर चर्चा करना जरूरी है, जिनका प्रभाव सीधे तौर पर जनता पर पड़ रहा है और जिसके द्वारा जनता को नए कानूनों के द्वारा शिकंजे में जकड़ा जा रहा है। इस लोकतंत्र में अब हम भारतीय ‘लोक’ नहीं हैं, बल्कि अब सरकार ने उसे प्रजा बना दिया है। और इसका शुभारंभ संसद में ‘सेंगोल की स्थापना से हो गया है। अखंड भारत की एक नई परिभाषा परोसी जा रही है। सरकार ने इन दिनों अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए एक नया तरीका ढूंढ लिया है, वह सीधे तौर पर नहीं, बल्कि जनता की प्रगति और विकास के नाम पर कई ऐसे निर्णय ले रही है या बिल पास करवा रही है जिसकी आड़ में जनता को अपने अधिकारों से वंचित रखा जा सके।
हाल में ही कई ऐसे निर्णय लिए गए जो जनता के लिए उचित नहीं हैं लेकिन वो समझ नहीं पा रही है। आज जनता की स्थिति ठीक वैसे ही है जैसे किसी मेंढक को किसी ठंडे पानी के बर्तन में रख दिया जाए तो वह बड़ा खुश रहता है लेकिन उस बर्तन के नीचे एक स्टोव जलाकर रख दिया जाए तो मेंढक धीरे-धीरे अपने आपको उस बढ़ते हुए तापमान के साथ एडजस्ट करते रहते हैं लेकिन जैसे ही पानी में उबाल आ जाता है वह दम तोड़ देता है। ऐसा ही कुछ आज हो रहा है। नए-नए निर्णय लिए जा रहे हैं जैसे फॉरेस्ट एक्ट, डेटा प्राइवेसी एक्ट, जीएसटी एक्ट, प्रोवेशनल ऑफ मनी लेंडरिंग एक्ट, जासूसी और पेगासेस से संबधित निर्णय, नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर कई निर्णय, सीएए, आरटीआई, टैक्स से जुड़े निर्णय और तो और आईबीसी के निर्णय द्वारा चोर-उचक्कों-दलालों को बैंक द्वारा ढेर सारी सुविधाएं दी जा रही हैं और आसानी से उनका कर्ज माफ हो जाता है और वे सब कुछ समेट कर विदेश भाग जाते हैं।
आजादी के भव्य महल की र्इंटें धंसने लगी हैं। ऊपर से दिखने में सब कुछ इतना अच्छा लगता है जैसे कि सरकार यह सब निर्णय जनहित में ही ले रही है, वास्तविकता कुछ और ही होती है। इन निर्णयों की आड़ में जनता के मौलिक अधिकारों, सुरक्षा, आर्थिक संबल के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। दरअसल, बीजेपी ने यह थ्योरी प्रसिद्ध चाइनीज स्ट्रेटेजिक थ्योरी ‘सलामी स्लायसिंग’ से ली है। भाजपा सरकार ने इस सलामी स्लाइसिंग की नीति को पिछले ९ वर्षों में भारतीय नागरिकों के अधिकारों को छीनने के लिए लागू किया है। थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद हर एक्ट में बदलाव करके नागरिकों पर कानून का शिकंजा कसा जा रहा है और नागरिकों को जीने के सभी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। हालांकि, इन दिनों जनता में जागृति आई है, कुछ गिने-चुने समाचार-पत्र, कुछ यूट्यूब चैनल्स के माध्यम से जनता सरकार की नीयत को समझ रही है, पर सरकार क्रूरता के साथ कई कानून संसद में बिना बहस के पास करवा रही है, जिसे नागरिक और सभ्य समाज कभी भी स्वीकार नहीं करेगा।
प्रेस की अभिव्यक्ति पर भी शिकंजा कसने को सरकार तैयार बैठी है। इस तरह धीरे-धीरे सरकार ने चाइनीज थ्योरी सलामी स्लायसिंग के द्वारा ‘नागरिकों’ को ‘प्रजा’ बना दिया। अविश्वास मत के दौरान जिस तेजी से बिल पास हुए हैं उसे देखकर तो जनता भी हैरान थी। ऐसी क्या जल्दी थी सरकार को, जबकि मणिपुर हिंसा पर प्रधानमंत्री जी बोलने को तैयार ही नहीं थे। इतना ही नहीं, वे तो दो दिन संसद में भी नहीं आए और आए तो जिस तरह से उन्होंने अपने लंबे ‘भाषण’ में विपक्ष की हंसी उड़ाई, हंसी-ठिठोलियां की, तंज मारे जो कि किसी भी देश के प्रधानमंत्री की छवि की गरिमा के अनुरूप नहीं था। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने माननीय (?) और पढ़े-लिखे (?) मंत्रियों और सांसदों से नारे भी लगवाए। ऐसा लगा कि यह भाषण अविश्वास मत पर नहीं, बल्कि कोई चुनावी भाषण या रैली है। इस तरह का माहौल आज तक संसद में देखा नहीं गया, लेकिन मोदी जी ने यहां भी एक नई प्रथा प्रारंभ कर दी। जब देश का प्रधानमंत्री ही देश की गरिमा को मिट्टी में मिला दे और सभा के स्पीकर गरिमा के अनुरूप कार्य न करें तो संसद तो क्या देश गर्त में चला जाता है।
मणिपुर के मामले में समुदायों को हिंदू और ईसाइयों में बांट दिया गया। वैसे ही जैसे गुजरात में २००२ के दौरान हिंदू और मुसलमान समुदायों के बीच स्थायी लकीर खींच दी गई। मणिपुर जल गया पर मोदी जी बंगलुरु में चुनावी रैली में खुद पर पुष्पवर्षा करवा रहे थे। उस पर उनका लंबा मौन एक प्रकार से एक संकेत था जैसे भारत को मणिपुर से कुछ लेना-देना ही नहीं था। मोदी जी ने मणिपुर के साथ एक विदेशी भूमि की तरह व्यवहार किया। ऐसा अपमान स्वतंत्र भारत में तो कभी देखा नहीं गया।
बड़े-बड़े आश्वासन देना तो अब सरकार की पहचान बन गई हैं। आश्वासन से रोजी-रोटी, रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा नहीं मिलती, यह हम सब जानते है, इसीलिए जनता की आंखों से यह पट्टी अब धीरे-धीरे हट रही है। बीजेपी को अब आनेवाले चुनावों में अपनी स्थिति का अंदाजा हो गया है इसीलिए बीजेपी/आरएसएस में भीतरी बौखलाहट अब सामने दिखाई देने लगी है। सच ये है कि देश ९ वर्षों में बांट दिया गया धर्मों, जातियों और वर्गों में। भाजपा और आरएसएस ने मिलकर भारत में चीनी रणनीति सलामी स्लाइसिंग लागू कर दी, पर हम भारतीय इसे बहुत देर से समझ पाए। अभी भी देर नहीं हुई है और उम्मीद है जनता इस विभाजनकारी सलामी स्लाइसिंग की नीति को समझेगी और अगली बार जब मतदान करने को उतरेगी तो सोच-समझ कर बटन दबाएगी। शायद लोकतंत्र को बचाने की ये आखिरी लड़ाई होगी।
(स्तंभ लेखक आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक है)

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