मुख्यपृष्ठग्लैमरबच्चे मुझे गधा कहते हैं!- राजीव मेहता

बच्चे मुझे गधा कहते हैं!- राजीव मेहता

जेडी मजीठिया के निर्माण और आतिश कपाड़िया के शो ‘खिचड़ी’ में प्रफुल्ल पारेख का किरदार निभानेवाले राजीव मेहता इस शो के बाद घर-घर में लोकप्रिय हो चुके हैं। शो ‘बा बहू और बेबी’, ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’, ‘बड़ी दूर से आए हैं’ में अहम भूमिका निभानेवाले राजीव मेहता रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘रंगीला’ सहित ‘हेराफेरी’, ‘खिलाड़ी’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुके हैं। पेश है, राजीव मेहता से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
`खिचड़ी’ में प्रफुल्ल का किरदार ऑफर होने पर आपका क्या रिएक्शन था?
‘खिचड़ी’ का पहला सीजन टीवी शो था। मुझे बेहद खुशी हुई कि प्रफुल्ल का किरदार निभाने का मुझे मौका मिला। इस किरदार के लिए मैं ओरिजिनल च्वॉइस था। इस कॉमेडी शो को लिखनेवाले आतिश कपाडिया ने इसे बेहद शानदार तरीके से लिखा।
अपने फैंस के साथ आपके किस तरह के अनुभव रहे?
मैं यह तो नहीं कहूंगा कि ऐसे अनगिनत अनुभव हैं लेकिन जो चुनिंदा अनुभव हैं वो बहुत खास और यादगार हैं। मुंबई के जिस इलाके में मैं रहता हूं वहां मेरे घर के पास एक स्कूल है। इसी स्कूल में जानेवाले बच्चे जानते हैं कि मैं कहां रहता हूं। अब बच्चे तो बच्चे हैं, क्या कीजिएगा जनाब? जब ये बच्चे स्कूल के लिए निकलते हैं तो मेरे घर आते ही वो चिल्लाने लगते हैं, ‘प्रफुल्ल, तू तो गधा है गधा!’ यह कॉमेडी पंच वाली लाइन बच्चों ने इसी ‘खिचड़ी’ शो से उठाई है। मैं इस तरह बच्चों की चिढ़ाने वाली बात सुनकर बहुत परेशान हो जाता था। कभी-कभी लगता था घर के दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लूं। लेकिन मैंने सोचा, बच्चे मुझे प्रफुल्ल कहते हैं, गधा कहते हैं, यह मुझे नहीं मेरे किरदार प्रफुल्ल से कहते हैं। मैंने भी बच्चों के इस अंदाज को हल्के-फुल्के में लेना शुरू कर दिया और प्रफुल्ल के इस किरदार पर मुझे गर्व महसूस होने लगा।
प्रफुल्ल और राजीव मेहता में कितनी समानता है?
प्रफुल्ल और राजीव मेहता में कोई समानता नहीं है। प्रफुल्ल की जिंदगी और मेरी जिंदगी में काफी अंतर है। बस, मैं इतना ही कह सकता हूं कि मैं और किरदार ‘प्रफुल्ल’ दोनों ही गुजराती हैं।
शो ‘खिचड़ी’ के माध्यम से प्रफुल्ल ने दर्शकों को किस तरह का मैसेज दिया?
लेखक आतिश कपाडिया और निर्माता जे.डी. मजीठिया ने कोई मैसेज दिमाग में रखकर न इस शो का निर्माण किया और न ही इसे लिखा है। शो ‘खिचड़ी’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कॉमेडी सिचुएशन के साथ हो रही है। शब्दों की हेराफेरी नहीं और न ही इसे जबरदस्ती खींच-तान कर निर्माण किया है। कहानी में जो भी किरदार हैं उनकी कॉमेडी घटनाओं के जरिए घट रही है। सभी मजेदार किरदारों के संगम का मतलब है ‘खिचड़ी’।
अब तक का आपका सफर कैसा रहा?
मैंने थिएटर करने के साथ ही टीवी और फिल्मों में भी काम किया है, लेकिन प्रफुल्ल भाई पारेख के किरदार ने मुझे काफी नाम दिया। कुछ किरदार नाम देते हैं और कुछ आर्थिक स्टैबिलिटी देते हैं तथा कुछ मानसिक संतुष्टि देते हैं। प्रफुल्ल भाई पारेख ने मुझे एक साथ सब कुछ दे दिया। इस टीवी शो से मुझे पहचान मिली। शुरू-शुरू में बच्चों के चिढ़ाने पर मुझे बहुत अफसोस होता था लेकिन वो अफसोस नहीं मेरी लोकप्रियता का वजूद था, इसे समझने में मुझे वक्त लगा। मैं टीवी का शुक्रगुजार हूं।
किन मुख्य बदलावों को आप टीवी इंडस्ट्री में देखते हैं?
टीवी इंडस्ट्री मुख्यत: पारिवारिक, कॉमेडी शोज पर टिकी है। पारिवारिक शोज में मुख्यत: फोकस सास-बहू-किचन पॉलिटिक्स पर किया जाता है। लेकिन कई बार लगता है कि बहुत ज्यादा नेगेटिव किरदार बनते जा रहे हैं, तो रियल्टी शोज की भरमार भी नजर आती है। मुझे लगता है अगर टीवी इंडस्ट्री को ओटीटी से कॉम्पीट करना है तो अच्छी कहानियों पर उसे फोकस करना चाहिए। आउट ऑफ द बॉक्स आने का वक्त आ चुका है और इसी बदलाव की अब उम्मीद है।

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