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जलवायु परिवर्तन ले सकता है एक अरब लोगों की जान! … कनाडा के शोधकर्ताओं ने किया खुलासा

एजेंसी / नई दिल्ली
दुनियाभर में बढ़ती जनसंख्या और जंगलों की कटाई की वजह से ग्लोबल वार्मिंग यानी जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहा है। इस परिवर्तन का असर इंसानों के साथ-साथ जीव-जंतुओं पर भी पड़ता है। आने वाले समय में ये जलवायु परिवर्तन और अधिक खतरा बन सकता है। कनाडा में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग दो डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो अगली शताब्दी में लगभग एक अरब लोगों की जान ले सकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि तेल और गैस उद्योग ४० प्रतिशत से अधिक कार्बन उत्सर्जन के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं, जो अरबों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है, जिनमें से कई लोग दुनिया के सबसे दूरस्थ और कम संसाधन वाले समुदायों में रहते हैं। मिली जानकारी के अनुसार, एनर्जीज जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में आक्रामक ऊर्जा नीतियों का प्रस्ताव दिया गया है, जो कार्बन उत्सर्जन में तत्काल और ठोस कमी लाने में सक्षम होगी। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के डीकार्बोनाइजेशन में तेजी लाने के लिए सरकार, कॉर्पोरेट और नागरिक कार्रवाई के ऊंचे स्तर की भी सिफारिश करता है, जिसका लक्ष्य अनुमानित मानव मौतों की संख्या को कम करना है। शोधकर्ताओं ने पाया कि कार्बन उत्सर्जन की मानव मृत्यु दर पर सहकर्मी-समीक्षित साहित्य `१,०००-टन नियम’ पर आधारित है, जो एक अनुमान है कि हर बार लगभग १,००० टन जीवाश्म कार्बन जलने पर भविष्य में एक समय से पहले मौत हो जाती है।

हमें तेजी से कार्य करना होगा
कनाडा में वेस्टर्न ओंटारियो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोशुआ पीयर्स ने कहा, `यदि आप १,००० टन के नियम की वैज्ञानिक सहमति को गंभीरता से लेते हैं और संख्याओं को चलाते हैं तो मानवजनित ग्लोबल वॉर्मिंग अगली शताब्दी में एक अरब समयपूर्व शवों के बराबर होगी। जाहिर है, हमें तेजी से कार्य करना होगा।’ पीयर्स को उम्मीद है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की भाषा और मेट्रिक्स को बदलने और चुनौती देने से अधिक नीति निर्माता और उद्योग के नेता जीवाश्म र्इंधन पर दुनिया की निर्भरता के बारे में कठिन सच्चाइयों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे। पीयर्स ने कहा, `जैसे-जैसे जलवायु मॉडल की भविष्यवाणियां स्पष्ट होती जा रही हैं, हम बच्चों और भावी पीढ़ियों को जो नुकसान पहुंचा रहे हैं, उसका जिम्मेदार हमारे कार्यों को माना जा सकता है।’

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