मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३ : सिर्फ जीत पर दांव!

कॉलम ३ : सिर्फ जीत पर दांव!

राजस्थान में कांग्रेस पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में जिताऊ प्रत्याशियों पर ही दांव लगाएगी। पार्टी को जिस प्रत्याशी की जीत तय लगेगी उसे मैदान में उतारा जाएगा, फिर चाहे उसकी उम्र कितनी भी अधिक क्यों न हो। कांग्रेस का प्रयास है कि राजस्थान में लगातार दूसरी बार सरकार बना कर हर बार सरकार बदलने के मिथिक को तोड़ा जाए। इसलिए पार्टी के बड़े नेता अलग-अलग एंगल से सभी २०० विधानसभा क्षेत्रों में जीतने वाले प्रत्याशियों के लिए सर्वे करवा रहे हैं, जिस व्यक्ति का नाम भी सर्वे में उभर कर आएगा उसको ही इस बार कांग्रेस पार्टी टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारेगी। कांग्रेस के बड़े नेताओं का मानना है कि आम कार्यकर्ता से लेकर निर्वाचित जनप्रतिनिधि तक कोई भी टिकट के लिए आवेदन कर सकता है। वरिष्ठ नेता पूरी तरह से छानबीन कर अंतिम सूची में जीतने वाले नाम पर ही मुहर लगाएंगे।
जयपुर में संपन्न हुई नवगठित प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल व प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा की मौजूदगी में कहा था कि हम चुनाव जीतेंगे। हमने प्रदेश की जनता के भले के लिए बहुत से नए काम किए हैं तथा बहुत सी नई योजनाएं प्रारंभ की हैं, जिससे प्रदेश की अधिकांश जनता लाभान्वित हो रही है। हमारे द्वारा शुरू किए गए कामों की बदौलत ही राजस्थान के लोगों ने कांग्रेस पार्टी को फिर से जिताने का मानस बना लिया है। कांग्रेस के सभी नेता मिलजुल कर पूरी एकजुटता के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे। जबकि भाजपा में आज भी अलग-अलग नेताओं के अलग-अलग गुट बने हुए हैं। ऐसे में प्रदेशवासी कांग्रेस की ही सरकार बनाने की चर्चा करने लगे हैं।
पहली बैठक के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि विधानसभा चुनाव में युवा हो या बुजुर्ग हो टिकट वितरण में केवल जिताऊ को ही देखा जाएगा। यही सबसे बड़ा क्राइटेरिया होगा। गहलोत का मानना है कि कर्नाटक चुनाव में ९० साल के व्यक्ति को भी टिकट दिया गया था जो चुनाव जीतकर आया। इसलिए जो जीत सकता है उसको ही टिकट दिया जाएगा। गहलोत के इस बयान से साफ है कि उदयपुर चिंतन शिविर के घोषणापत्र का पालन टिकटों में नहीं होगा। आगामी विधानसभा चुनाव में युवाओं को टिकटों में प्राथमिकता देने की जगह जिताऊ का मापदंड रहेगा। गहलोत का कहना है कि भाजपा तो हार मान चुकी है। जबकि हम चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। भाजपा में दिल्ली से आकर नेता चुनाव लड़ेंगे तो जनता इनसे पूछेगी कि क्या हमारे फैसले भी आप दिल्ली से बैठकर करोगे। भाजपा की यह स्थिति है कि उनके पास चुनाव लड़ने के लिए चेहरा तक नहीं है।

रमेश सर्राफ धमोरा
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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