मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३ : ‘इंडिया’ पर भाजपा की अवसरवादी सियासत!

कॉलम ३ : ‘इंडिया’ पर भाजपा की अवसरवादी सियासत!

श्रीकिशोर शाही
आज तक इस देश के नाम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। इंडिया कहो या भारत, लोग दोनों को एक समझते थे। पर जब से विपक्षी गठबंधन का नाम ‘इंडिया’ रखा गया, अचानक भाजपा को इस नाम से परहेज होने लगा। अब उसे ‘भारत’ नाम प्यारा लगने लगा है। इसकी झलक हाल ही में जी-२० समिट के दौरान राष्ट्रपति द्वारा भोज के लिए भेजे गए निमंत्रण पत्र पर देखने को मिला, जहां प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया की बजाय प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा हुआ था। प्रबुद्ध लोगों ने सोशल मीडिया पर इसकी काफी आलोचना भी की। पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि २० साल पहले जब देश का नाम भारत रखने का एक प्रस्ताव लाया गया था तो भाजपा ने वॉकआउट कर दिया था, तब भारत से इतनी चिढ़ और अब अचानक इतना प्यार होने का मतलब साफ है कि मामला भावनात्मक से ज्यादा राजनीतिक है।
बात २००४ की है। सपा नेता और यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव देश का नाम बदलने का एक प्रस्ताव यूपी विधानसभा में ले आए थे, तब मुलायम देश का नाम ‘इंडिया’ से भारत करना चाहते थे। मुलायम के नेतृत्व वाली वैâबिनेट ने २००४ में एक प्रस्ताव पारित किया था कि संविधान में संशोधन करके ‘इंडिया दैट इज भारत’ की बजाय ‘भारत दैट इज इंडिया’ कहा जाना चाहिए। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के इस प्रस्ताव को राज्य विधानसभा में सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन भाजपा प्रस्ताव पारित होने से पहले ही सदन से वॉकआउट कर गई। वर्ष २००४ में इंडिया को भारत नाम बदलने के प्रस्ताव में मुलायम सिंह यादव की विचारधारा किसी भी औपनिवेशिक चीज को दूर करने के साथ तालमेल बैठा रही थी, जिसमें अंग्रेजी को त्यागना और राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में एक समाजवादी रुख शामिल था। ब्रिटिश शासन के २०० वर्षों के दौरान इसका नाम ‘इंडिया’ रखा गया था। आज आप कितना भी अंग्रेजी का विरोध कर लें, पर सच तो यह है कि हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही देश की प्रमुख भाषाएं हैं। आज शिक्षा में अंग्रेजी का महत्व काफी बढ़ चुका है। हिंदी में भी ‘आई लव माई इंडिया’ जैसे गाने सुनकर नई पीढ़ी बड़ी हुई है, ऐसे में अगर किसी को इंडिया नाम से आज तकलीफ हो रही है तो यह मामला विशुद्ध राजनीतिक समझा जाना चाहिए।

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