मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३: जिम्मेदारी से न भागें हुकूमतें

कॉलम ३: जिम्मेदारी से न भागें हुकूमतें

डॉ. रमेश ठाकुर, नई दिल्ली
तेज भागती जिंदगी और मशीनरी युग में दौड़ती इंसानी जीवनशैली में जोखिमों की कमी नहीं है। किसी के साथ कब क्या हो जाए, कुछ नहीं पता? नागरिक सुरक्षा दुरूस्त करना, चाहें राज्य की सरकारें हों या केंद्र सरकार, सबका पहला धर्म होता है कि वह अपने लोगों को सुरक्षा की गारंटी दें। इस दायित्व से कोई मुंह नहीं मोड़ सकता। समाज का जिम्मेदार नागरिक जब अपनी सरकार से किसी चीज की मांग करता है, उसके लिए उसे धरना, आंदोलन भी करना पड़ता है, तो उसका समाधान निकालना सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है। पर, आज के वक्त में परिदृश्य बहुत बदल चुके हैं। नागरिक मांगों पर सरकारें मुंह फेरती हैं, सामाजिक मुद्दों की अनदेखी करती हैं। तब, ऐसा प्रतीत होता है कि सामाजिक सुरक्षा को लेकर हुकूमतें गंभीर नहीं हैं। हुकूमतें ऐसा ना करें, यही याद दिलाने के लिए प्रत्येक वर्ष १४ अगस्त को ‘राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा दिवस’ मनाया जाता है।
राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा की गारंटी बदलते समय की जरूरत है। क्योंकि आधुनिक यांत्रिक युग में इंसान अनेक प्रकार की घटना-दुर्घटनाओं का शिकार होता रहता है। उन दुर्घटनाओं से मुक्ति दिलाने के लिए आवश्यक होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को सरकारें सामाजिक सुरक्षा की मुकम्मल गांरटी दें। वक्त जोखिमों से भरा है, कोरोना जैसी अचानक दस्तक देनी वाली जानलेवा महामारी, प्रकृतिक आपदाएं, बेमौसम बारिश से प्रभावित होते किसान, बाढ़-बारिश से पीड़ित गरीब आदि को उबारने के लिए सामाजिक सुरक्षा का होना अब और जरूरी हो गया है, ऐसे में अपने अधिकारों के प्रति सचेत और जागरूक होने की जरूरत होती है। कई बार ऐसा होता है कि जागरूकता के अभाव में हम अपने अधिकारों को भूल जाते है और शोषण का शिकार हो जाते हैं।
नागरिक सुरक्षा हेतु कुछ अधिनियमों के प्रावधान हैं, जिन्हें सरकार ने ही नागरिकों के लिए बनाए हैं। जैसे, कर्मचारी प्रोविडेंट फंड अधिनियम, कोयला खान भविष्य निधि एवं विविध उपबंध, श्रमिक क्षतिपूर्ति संशोधित, प्रसूति लाभ अधिनियम, राज्य बीमा संशोधित अधिनियम, कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध व्यवस्था अधिनियम, वृद्धावस्था पेंशन योजना, अनुग्रह भुगतान संशोधित अधिनियम व सामाजिक सुरक्षा सर्टीफिकेट आदि, ये ऐसे अधिनियम हैं जिनमें सरकारें बंधी होती हैं। इन अधिनियमों के मुताबिक, कानूनन सुरक्षा देनी ही होती है। इनका जब उलंघन होता है तो लोगों को मजबूरन कोर्ट-कचहरी जाना पड़ता है। इसलिए सभी नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की दरकार है।

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