मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३ : हाथ से मिले हाथ, लेकिन मिले ना दिल...?

कॉलम ३ : हाथ से मिले हाथ, लेकिन मिले ना दिल…?

प्रभुनाथ शुक्ल
भदोही, (उप्र)
दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन से भारत-चीन के संबंधों पर एक सकारात्मक संदेश आया है। डोकलाम विवाद के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने कई सालों बाद हाथ बढ़ाया है। हालांकि, दोनों नेताओं के मुलाकात की कोई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि ब्रिक्स सम्मेलन का यह अंतिम दिन था। इस मुलाकात को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं कि पहल किसकी ओर से की गई। वैसे दोनों शीर्ष नेताओं की मुलाकात के बाद भारत-चीन के बीच सीमा विवाद पर आपसी सहमति बनी है। दोनों देशों के बीच संवेदनशील सीमा क्षेत्र से सैन्यबलों की वापसी पर भी बातचीत हुई है। चीन ने भी कहा है कि दोनों देशों के मध्य आपसी सहमति और शांति आवश्यक है। हालांकि, भारत, चीन को पहले ही तल्ख संदेश दे चुका था कि जब तक सीमा पर शांति नहीं होगी, तब तक बातचीत संभव नहीं है।
एशिया में भारत और चीन सशक्त राष्ट्र हैं, लेकिन दोनों महाशक्तियों के बीच शांति की बात पश्चिमी देशों को नहीं पचती। वे चाहते हैं कि भारत और चीन आपसी विवादों में उलझे रहे, जिससे दोनों देशों में हथियार की होड़ बढ़ती रहे। भारत और चीन के लिए यह बेहतर होगा कि सीमा की सुरक्षा को लेकर दोनों एक दूसरे के भरोसे का सम्मान करें। एक-दूसरे से आंतरिक भय से बचें और आपस में विश्वास कायम रखें। लेकिन चालबाज चीन अपनी नीति पर कितना अडिग रहेगा, यह वक्त बताएगा।
भारत-चीन के विदेश सचिवों ने मोदी और जिनपिंग की मुलाकात के बाद यह कहा है कि लद्दाख क्षेत्र में दोनों देश सीमा पर शांति बहाली के लिए तैयार हो गए। सैन्य अधिकारियों को निर्देश भी दिए गए हैं कि संबंधित इलाकों में सैन्य दबाव कम किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से साफतौर पर कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जब तक शांति नहीं होगी, तब तक दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हो पाएगा। निश्चित रूप से ऐसे हालात तभी बनेंगे, जब दोनों देश एक-दूसरे पर भरोसा करेंगे। इसके पूर्व इंडोनेशिया में दोनों नेताओं की जी-२० के सम्मेलन में सीमा विवाद पर बातचीत हुई थी। ब्रिक्स में मोदी और जिनपिंग के हाथ भले मिल गए होंगे, लेकिन दिल की मुलाकात मुश्किल है।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कोई नया नहीं है। १९५० से यह विवाद चला आ रहा है। इसी सीमा विवाद को लेकर १९६२ में भारत और चीन के बीच युद्ध भी हुए। चीन की पीपुल्स आर्मी अक्सर वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करती है। गलवान विवाद इसी का नतीजा था। भारत नई दिल्ली में जी-२० समिट की मेजबानी करेगा। उस समिति में चीन भी आएगा। ऐसे हालत में दक्षिण अफ्रीका के ब्रिक्स से दिया गया शांति का संदेश दोनों देशों के लिए अहम है। एशिया में भारत और चीन दो महाशक्तियां हैं। दोनों देशों के मध्य अगर अमन-चैन रहता है तो इसका सकारात्मक परिणाम दोनों देशों के अर्थव्यवस्था और विकास पर पड़ेगा। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर सकारात्मक संदेश जाएगा। फिलहाल, ब्रिक्स से दोनों देशों के मध्य शुरू हुई शांति प्रक्रिया का हमें स्वागत करना चाहिए।

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