मुख्यपृष्ठखबरेंकॉलम ३: पोक्सो बना वसूली का शस्त्र!

कॉलम ३: पोक्सो बना वसूली का शस्त्र!

जितेंद्र मल्लाह

जिस देश में महिलाओं खासकर बच्चियों को देवी की तरह पूजा जाता है, वहां महिलाओंं की सुरक्षा अब रोज ही खतरे में पड़ने लगी है। बच्चियां अपनों के बीच भी सुरक्षित नहीं रही हैं। हालांकि बच्चों के साथ होनेवाले यौन उत्पीड़न और अश्लीलता से जुड़े अपराधों पर रोक लगाने के लिए वर्ष २०१२ में पॉक्सो यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन प्रâॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट बनाया गया था, जिसे और सख्त बनाते हुए वर्ष २०१९ में पॉक्सो कानून में संशोधन करके इसमें मौत की सजा का भी प्रावधान कर दिया गया। अब इस कानून के तहत उम्रवैâद की सजा पानेवाले दोषी को आजीवन जेल में ही रहना होगा। इतने सख्त कानूनों के बावजूद बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष २०२१ में पॉक्सो एक्ट के तहत देशभर में करीब ५४ हजार मामले दर्ज किए गए थे, जो कि इससे पहले वर्ष २०२० में ४७ हजार ही थे। वर्ष २०१७ से २०२१ के बीच ५ वर्षों में पॉक्सो एक्ट के तहत २.२० लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। बच्चों के यौन शोषण के बढ़ने की एक प्रमुख वजह है पोक्सो एक्ट के दुरुपयोग के कारण खत्म होता कानून का खौफ। जिस पर अब हाई कोर्ट भी चिंतित नजर आ रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीते गुरुवार को इस पर चिंता जताते हुए कहा था कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजकल, ‘अधिकतम मामलों’ में महिलाएं पोक्सो / एससी-एसटी अधिनियम के तहत झूठी एफआईआर दर्ज करा रही हैं, इसे सरकार से ‘पैसे हड़पने के हथियार’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और इस प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए। इसके पहले बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी पुरुष पर दुष्कर्म का झूठा आरोप उतना ही भयावह और पीड़ा देने वाला होता है, जितना किसी महिला के साथ दुष्कर्म होना। अत: बेकसूर को झूठे मामलों में फंसाने से बचाया जाना चाहिए। बेंच ने कहा कि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दुष्कर्म से पीड़िता को सबसे ज्यादा परेशानी और अपमान सहना पड़ता है, लेकिन साथ ही दुष्कर्म का झूठा आरोप आरोपी को भी उतना ही कष्ट पहुंचाता है। उसे अपमानित होना पड़ता है, उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है और आर्थिक नुकसान भी होता है। झूठे मामलों के कारण पॉक्सो एक्ट में कन्विक्शन रेट लगातार कम हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि पांच साल में ६१,११७ आरोपियों का ट्रायल कम्प्लीट हुआ है, जिनमें से सिर्फ २१,०७० यानी करीब ३५ज्ञ् को ही सजा मिली है। बाकी ३७,३८३ को बरी कर दिया गया। इसलिए ऐसे मामलों में सख्ती और जांच में गंभीरता के साथ-साथ दोषी को जल्द से जल्द सजा मिलनी चाहिए तथा कानून का दुरुपयोग बंद होना चाहिए। कोई बेगूनाह छूटना नहीं चाहिए और किसी निर्दोष को बेवजह परेशान न होना पड़े, इस बात का इमानदारी से प्रयास किया जाना चाहिए।

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