मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३: कोटा और छात्रों के सुसाइड पर सवाल!

कॉलम ३: कोटा और छात्रों के सुसाइड पर सवाल!

रमेश ठाकुर
नई दिल्ली
राजस्थान के कोटा शहर में अध्यनरत विद्यार्थियों की कथित सुसाइड की घटनाओं ने समूचे हिंदुस्थान का ध्यान अपनी ओर खींचा है। आला दर्जे की शिक्षा प्राप्ति के लिहाज से अभिभावकों में एक आम धारणा बन चुकी है कि अगर चोटी की प्रतियोगी परीक्षाएं पास करनी हैं, तो उनके जेहन में राजस्थान का ‘कोटा शहर’ आता है। क्योंकि कोटा शिक्षा का ‘महाकुंभ’ जो बन गया है। इसमें कोई दो राय भी नहीं कि वहां से शिक्षा लेकर बच्चे अपने सपनों को पंख लगा रहे हैं। पर दुर्भाग्य है कि ‘शिक्षा नगरी’ का खिताब हासिल कर चुका ये शहर गुजरे कुछ समय से ‘आत्महत्या’ के लिए चर्चाओं में हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि वहां चारों तरफ पैâले अदृश्य मौत के खौफ ने बच्चों को भयभीत कर दिया है। डर के चलते अभिभावक अपने बच्चों को वापस बुलाने लगे हैं। डिप्रेशन में आकर १९ से २२ वर्ष की आयु के छात्र मौत को गले लगा रहे हैं। बीते आठ माह के भीतर २४ छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। ये घटनाएं तत्कालिक नहीं हैं, सिलसिला सालों से बदस्तूर जारी है। कोटा में हर वर्ष सुसाइड की लगभग १५ से २० घटनाएं घट रही हैं।
कोटा में छात्रों द्वारा लगातार आत्महत्याओं की घटना के बाद राज्य सरकार और स्थानीय शिक्षण संस्थाओं पर लापरवाही व रक्षा-सुरक्षा के उपाय न करने के आरोप लग रहे हैं। आरोप लगने भी चाहिए? आखिर दोनों की सर्वप्रथम जिम्मेदारियां बनती हैं। हुकूमत और शिक्षण संस्थान आत्महत्या वाली घटनाओं से अपनी नजरें क्यों फेरते हैं? उसका भी कारण पानी की तरह साफ है। सरकार का टैक्स रूपी मुनाफा कमाना और शिक्षण संस्थाओं का छात्रों से मुंह मांगी फीस का सवाल जो होता है? आंकड़े तसदीक करते हैं कि कोटा में शिक्षा के नाम पर सालाना ६ हजार करोड़ का कारोबार होता है, जिसमें सरकार को औसतन ७०० करोड़ का टैक्स प्राप्त होता है। छात्रों से साढ़े सात लाख रुपए तक फीस के रूप में वसूले जाते हैं। इसके बावजूद ढाई से तीन लाख नए छात्र हर वर्ष कोटा पहुंचते हैं। कोटा में सरकार द्वारा २३ हॉस्टल पंजीकृत हैं, अपंजीकृतों की तादाद इससे कहीं ज्यादा हैं, जो अपनी कमाई का एक तिहाई हिस्सा सरकार को देती हैं।
प्रत्येक सुसाइड की घटना में पुलिस अपनी जांच-पड़ताल के बाद एक ही तर्क देती है कि बच्चे पढ़ाई का प्रेशर नहीं झेल पाने के कारण ऐसा कदम उठाते हैं? पुलिस-प्रशासन का तर्क कई मायनों में वाजिब भी दिखता है, अगर वास्तव में आत्महत्याओं का मूल कारण यही है तो उसमें सीधे-सीधे शिक्षण संस्थाएं ही दोषी मानी जाएंगी। क्योंकि कोचिंग संस्थान अब छात्रों के बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखकर शिक्षा ग्रहण नहीं करवाते। इतना प्रेशर डालते हैं कि अच्छे से अच्छा छात्र भी डिप्रेशन में चला जाए। बहरहाल, इस कृत्य में कोचिंग संस्थानों के साथ-साथ अभिभावक भी बराबर के जिम्मेदार हैं। छात्रों पर दोनों का संयुक्त रूप से एक जैसा प्रेशर होता है। ऐसी अनहोनी घटनाओं के पीछे मनोचिकित्सकों का मानना है कि बदलते दौर में जब बच्चों की उम्र खेलकूद की होती है, तब उनके समक्ष गला-काट प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करना, नॉर्मल स्कूलों की जगह कोचिंग संस्थानों के टफ स्टडी पैटर्न को झेलना, सामने वाले से बेहतर करने का घनघोर दबाव और उसके बाद शिक्षक-पेरेंट्स का बच्चों पर जरूरत से ज्यादा उम्मीद करना। सही मायनों में देखें तो सुसाइड केसों के मूल और तात्कालिक कारण यही हैं। इन कारणों को शिक्षक-अभिभावक भलीभांति जानते भी हैं, लेकिन अनदेखी कर देते हैं।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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