मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३ : आरक्षण लागू हो, इंतजार क्यों?

कॉलम ३ : आरक्षण लागू हो, इंतजार क्यों?

डॉ. रमेश ठाकुर, नई दिल्ली

संसद में बीते २७-२८ वर्षों से लटका ‘महिला आरक्षण विधेयक’ फिलहाल लोकसभा में पास हो गया। लेकिन ये तय है कि मात्र पास होने भर से महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलने लगेगा? क्योंकि सरकार ने अपने मंसूबे दिखा दिए हैं, बता दिया है कि पहले परिसीमन होगा उसके बाद आरक्षण का खाका तैयार होगा। जबकि विपक्षियों की मांग है कि आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू हो और कायदा भी यही बनता है। खैर, देर आए, दुरुस्त आए? जहां तक सियासत में महिलाओं की मौजूदगी की बात है, तो अभी तक संसद के दोनों सदनों में १५ व विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में मात्र १० फीसदी भागीदारी रही है। हां, पंचायतों में महिलाओं की संख्या शुरू से अच्छी-खासी है। इन आंकड़ों में बदलाव हो, इसके लिए ही ३३ फीसदी महिला भागेदारी को लेकर आरक्षण बिल पर केंद्रीय मीटिंग में केंद्र सरकार ने मुहर लगाई है।
महिला आरक्षण बिल को लेकर यूपीए-२ के आखिरी कार्यकाल के अंतिम महीनों में भी प्रयास हुए थे, पर तब विरोध इतना जबरदस्त था कि जिससे सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े? लेकिन इस दफे का शोरगुल बता रहा था है कि बिल पक्के तौर पर पास हो जाएगा और हुआ भी? लेकिन चुनौतियां अब भी बहुतेरी हैं। हालांकि, विपक्ष विरोध में नहीं है, पर लटकाने के विरोध में जरूर है। विपक्ष नहीं चाहता है कि अब विधेयक कहीं लटके?
बहरहाल, महिला आरक्षण बिल को मोदी सरकार एक बड़ा चुनावी हथकंडा मानकर चल रही है। सरकार इसे तुरुप का पत्ता मान रही है। क्योंकि २०२४ में उनका पूरा फोकस महिलाओं पर है। इसमें कुछ राजनीतिक होशियारियां भी समाहित हैं। दरअसल, इस चुनावी एजेंडा का क्रियान्वयन बड़े सोच समझकर सरकार ने किया है। उदाहरण के तौर पर थोड़ा समझें, जैसे जिन-जिन सीटों पर विपक्ष के मजबूत उम्मीदवार खड़े होंगे, उन सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा। उस स्थिति में विपक्षी ताकत काफी हद तक कम होगी? ऐसी स्थिति में खुदा न खास्ता अगर उनके घर में कोई महिला प्रत्याशी नहीं हैं, तो जाहिर है, वहां कोई और ही बाजी मार ले जाएगा। सभी जानते हैं कि चुनावो में प्रत्याशी बदलते ही खेल बिगड़ जाता है। ऐसे दांव से विरोधी अपने आप निपट जाते हैं।
कुलमिलाकर, मोदी सरकार उज्ज्वला स्कीम और तीन तलाक की सफलता को चुनाव में हर सूरत में साधना चाहती है। इन दोनों से उन्होंने महिलाओं की बड़ी आबादी को अपनी ओर खींचने की कीशिश की है। महिला आरक्षण बिल को लेकर बेशक भाजपा इस वक्त खूटा गाड़े खड़ी हो, पर संशय उनको भी है भविष्य को लेकर? इस थ्योरी को ऐसे समझ सकते हैं। देखिए, पिछड़ा वर्ग की राजनीति कहें या फिर कहें कि पुरुषों की सियासी, जिसकी वजह से ये महिला आरक्षण बिल लंबे वक्त से अधर में लटका रहा। इससे उन सांसदों को खतरा है, जो संसद के एक कार्यकाल के लिए एक तिहाई उम्मीदवार खो देंगे, क्योंकि रोटेशन में ही आरक्षण मिलेगा और इसमें एक तिहाई चुनाव क्षेत्रों पर गाज गिरेगी। ऐसे में पुरुष सांसद सत्ता और ताकत के बंटवारे के लिए तैयार नहीं है। अंदरूनी खाने देखे, तो कई भाजपा के भी ऐसे सांसद हैं, जो दबी जुबान में इस बिल को लेकर असहमत हैं। खैर, अब बिगुल बज चुका है, कहानी अब आर या पार होने वाली है।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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