मुख्यपृष्ठखबरेंकॉलम ३...तो विवेक पहले मर जाता है!

कॉलम ३…तो विवेक पहले मर जाता है!

दीपक शर्मा

जब ‘मतभेदों’ का स्थान ‘मनभेद’ ले लेता है, तब तमाम सार्वजनिक विमर्श व संवाद अपने मायने खो देते हैं। क्योंकि संवाद के जरिए मतभेद को तो सुलझाया जा सकता है, लेकिन मनभेद उत्पन्न होने की स्थिति में इससे उबर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं होता है।
यही मनभेद आज राजनीतिक विमर्श में देशभक्ति बनाम देशद्रोह होकर एक-दूसरे की राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर संदेह जताने और व्यक्ति विशेष पर आ पहुंचे हैं। इस स्थिति को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दुर्भाग्यपूर्ण काल माना जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश भारत में अब विमर्श और इससे निकले संवाद इसी मुकाम पर पहुंच चुके है। एक समय वह भी था, जब प्रधानमंत्री समूचे राष्ट्र का संवाद माने जाते थे और विपक्ष सत्ता की आलोचना करने का अपना विपक्षी धर्म जरूर निभाता था। इस सबके बावजूद चाहे जितनी कटुता हो सार्वजनिक विमर्श में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना रहता था। लेकिन मौजूदा काल में ये परंपरा ऐसी टूटी है कि अब राजनीति की भाषा में अपशब्दों तक का खुलकर इस्तेमाल होने लगा है। पराधीनता का दंश झेल चुके किसी भी राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता दिवस से बढ़कर पवित्र अवसर और कोई नहीं हो सकता। लेकिन इस बार इसी दिन सार्वजनिक विमर्श के गिरते स्तर के अनगिनत उदाहरण देखने को मिले। ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने एक विशाल राष्ट्र के सर्वोच्च नेता की बजाय अपनी पार्टी भाजपा के नेता और उसकी विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में देश को संबोधित किया। विपक्षी दलों पर उन्होंने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण की नीति पर चलने के आरोप चस्पा किए।
तुरंत ही कांग्रेस से उनको इसका जवाब एक सख्त संवाद से मिला। कांग्रेस ने मोदी पर दुर्नीति और अन्याय के रास्ते पर चलने का आरोप तो लगाया ही, साथ ही उन पर बदनीयती के आरोप भी मढ़े। यानी कि कांग्रेस ने कहा कि प्रधानमंत्री की नीयत ही ठीक नहीं है। इसके ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ-ब्रायन का एक वीडियो मैसेज वायरल हो रहा था, जिसमें उन्होंने सीधे मोदी को संबोधित करते हुए उन्हें दगाबाज कहा। सोशल मीडिया पर तो ऐसी भाषा का इस्तेमाल काफी पहले आम हो चुका है। लेकिन अब यह मुख्यधारा की राजनीति में संवाद की भाषा भी बनती दिखाई दे रही है। इसकी शुरुआत सत्ताधारी भगवा पार्टी द्वारा विपक्षी नेताओं को ‘पप्पू’, ‘बाबा’, भ्रष्ट आदि कह कर उनकी सार्वजनिक छवि खत्म करने की जो कोशिश शुरू हुई थी, वह अब अपने पलटवार के मुकाम पर पहुंच चुकी है, ऐसा दिखाई देने लगा है। यह राजनीति का वह संक्रमण काल है, जो किसी महामारी की भांति भारतीय लोकतंत्र को बीमार कर क्षीण अवस्था में पहुंचाने पर आमादा है।
इस सबके बीच सर्वाधिक दुखद यह है कि आज सत्ता व विपक्ष के बीच का ऐसा कोई सेतु दिखाई नहीं दे रहा, जिसके जरिए सार्वजनिक विमर्श को सौहार्दपूर्ण बनाते हुए दोनों पक्षों के बीच स्वस्थ संवाद की स्थिति बना सके।
(लेखक पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

 

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