मुख्यपृष्ठस्तंभकॉलम ३ : शैक्षणिक गतिविधियों में राजनीति क्यों?

कॉलम ३ : शैक्षणिक गतिविधियों में राजनीति क्यों?

रमेश ठाकुर
नई दिल्ली
शिक्षा से सियासत दूर ही रहे, तभी अच्छा है। कर्नाटक में हिजाब का ऐसा बेमतलब मुद्दा उठ खड़ा हुआ है, जिसमें अगर राजनीति न हो तो ‘कर्नाटक एग्जाम अथॉरिटी’ और ‘कॉलेज प्रशासन’ आपस में मिलकर ही इसे आसानी से सुलझा लेते। लेकिन गंदी राजनीति इन दोनों अथॉरिटी को उनके मुकम्मल अधिकारों से दूर रखे हुए है। दूर इसलिए, आखिर उन्हें इस मुद्दे पर राजनीति करने का मौका जो मिल रहा है। स्कूल-कॉलेज में कैसी गतिविधियां हों, इसके हक-हुकूक व अधिकार सिर्फ शिक्षा-प्रशासन को ही रहे तो ज्यादा बेहतर हो, पर उनके कामों में लगातार अड़ंगा अड़ाया जा रहा है। कर्नाटक की शिक्षा-दिक्षा में जिस हिसाब से राजनीतिक दखल बढ़ा है, वह निश्चित रूप से छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। कर्नाटक में इस वक्त गरमाया हिजाब का मुद्दा शिक्षा के लिए अच्छा नहीं, इसको लेकर कर्नाटक सरकार भी पसोपेश में हैं। हिजाब पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के मुंह से जल्दबाजी में एक ऐसा बयान निकल गया, जिसने सियासी बखेड़ा खड़ा कर दिया। हालांकि, अगले ही दिन उनको स्पष्टीकरण भी देना पड़ा। बताया कि हिजाब पर लगा बैन हटाया नहीं है, बल्कि विचार किया जा रहा है। लेकिन शायद स्पष्टीकरण देते-देते उन्होंने काफी देर कर दी।
दरअसल, प्रदेश में हिजाब ऐसा जिंदा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा है, जो आसानी से शांत होने वाला नहीं है। चुनाव में जब कांग्रेस ने पिछली सरकार द्वारा हिजाब पर लगाए प्रतिबंध को हटाने का वादा किया तो उन्हें जबरदस्त चुनावी फायदा हुआ। अल्पसंख्यक आबादी का वोट उन्हें मिला, पर अब शायद उस वादे को पूरा करने में कांग्रेस सरकार को दिक्कत महसूस होने लगी है। कुल मिलाकर चुनाव से पहले तक जो मुद्दा बहुत तेजी से गर्माया हुआ था, वो एक बार फिर गरमा गया है। स्थानीय सरकार से लेकर शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व भी पसोपेश में है और निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया दिल्ली के उच्च स्तरीय नेताओं से मंत्रणा कर रहे हैं। वहां से उन्हें आदेश मिला है कि मुद्दे के शांत होने का इंतजार करें। लेकिन भाजपा किसी भी सूरत में ऐसा नहीं होने देगी। भाजपा हिजाब पर लगे प्रतिबंध को बरकरार देखना चाहती है, वहीं कांग्रेस का जनता से वादा है कि शैक्षणिक संस्थाएं इससे मुक्त होंगी। छात्रों के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होगा। हालांकि, हिजाब पर मची खलबली पर सरकार राज्य के तकरीबन सभी शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध हटाने पर विचार करना शुरू कर दिया है। लेकिन अंतिम निर्णय कब होगा, इसकी गारंटी शायद सरकार भी फिलहाल न दे पाए।
शिक्षण संस्थानों की गतिविधियों पर निर्णय लेने का अधिकार वैसे तो एग्जाम अथॉरिटी को ही होना चाहिए, लेकिन राजनीति इससे दूर रहे तभी बेहतर होगा। अभी दो महीने पहले ही कर्नाटक में बोर्ड की परीक्षाएं हुर्इं, जिसमें कर्नाटक एग्जाम अथॉरिटी ने नया ड्रेस कोड जारी किया, इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, मोबाइल फोन, पेन ड्राइव, ईयरफोन, माइक्रोफोन, ब्लूटूथ और रिस्ट वॉच पर रोक लगाई गई। छात्रों को सिर पर टोपी या कोई दूसरा कपड़ा पहनकर नहीं आने दिया, वहीं छात्राओं को ज्यादा कढ़ाई, फुल या बटन वाले कपड़े पहनने की इजाजत नहीं दी। परीक्षा कक्ष के भीतर पूरी आस्तीन के कपड़े, जींस पैंट, ऊंची एड़ी के जूते या चप्पल पहनने पर मनाही रही। इसके अलावा मंगलसूत्र और पैर में पहनी जाने वाली बिछिया को छोड़कर जूलरी पहनने पर भी रोक लगाई। दरअसल, इस तरह के प्रतिबंध लगाना कॉलेज प्रशासन का अधिकार होता है, लेकिन ऐसे कार्य जब खुद राजनीतिक लोग करने लगे तो चीजें दूसरी दिशा में चली जाती हैं।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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