करार करके आ

– डॉ. एम.डी. सिंह

शोहरत चाहिए तो करार करके आ
खुद पर दुनिया को बेकरार करके आ
तेरी कमर में खाली म्यान बंधी हुई
ऐ वक्त के खलीफा तलवार धर के आ
चल रहे बाजार तो जेबों की खबर रख
रुपया, पौंड, डॉलर, दीनार भर के आ
मुख्तसर से दिखे हैं सितारे जमीं से
बड़ा दिखना गर तुझे यार उतर के आ
दिखाना कद्दावर को अपना वजूद तो
कोई बात उसकी इनकार करके आ

खून सस्ता हो गया

खून सस्ता महंगा पानी हो गया है
जमाने को अब ये क्या हो गया है
आटा-रोटी पहुंच से बाहर हो गया है
हर एक निवाले का हिसाब हो गया है
खून की कीमत क्या पूछते हो भाई
अब सांसों का भी हिसाब-किताब हो गया है
अस्पताल अब प्रयोगशाला बन गए हैं
एटीएम की तरफ वेंटिलेटर का इस्तेमाल हो गया है
आम आदमी, आदमी नहीं रह गया है
शरीर पैसा कमाने का साधन हो गया है
जिंदगी की अब कोई कीमत नहीं बची
शरीर के हर अंग का अलग हिसाब हो गया है
– संजीव ठाकुर, रायपुर, छत्तीसगढ़

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