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नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

तेरी बांह में मर जाएंगे
तेरे अधरों की मधुर मुस्कान लेकर जाएंगे,
घाव हैं जो हृदय के वो क्षण में ही भर जाएंगे।
पीसते घुन सा मुझे जो रात-दिन आठों पहर,
मन के सारे द्वंद भी तो अब नहीं फिर आएंगे।
तेरी आंखों के ही सागर में सदा डूबा रहूूं,
ऐसा परमानंद तो हम अब कहां फिर पाएंगे।
पूर्व जन्मों का ही लेखा था मिले जो हम यहां,
अब तो सातों जन्म भी तेरी नजर कर जाएंगे।
प्रेम के ही पाश में तुम बांधकर रखना मुझे,
प्राण जब छूटे `नमन’ तेरी बांह में मर जाएंगे।
-अवधेश विश्वकर्मा `नमन’, मुंबई

कोई नया दरवाजा खुलता है
जब जिंदगी में कुछ धुंध छाता है,
जब गला हमारा रुंध जाता है,
कोई नया दरवाजा खुलता है।
जब हम ऐसे ही फंस जाते हैं,
जब किसी सामाजिक गहराई में धंस जाते हैं,
कोई नया दरवाजा खुलता है।
जब कोई अनायास ही हंस जाता है,
जब कोई अपने ही तंज कस जाता है,
कोई नया दरवाजा खुलता है।
जब जीती बाजी भी हार में बदल जाती है,
जब बरबस ही आंखों से मोती निकल जाता है,
कोई नया दरवाजा खुलता है।
क्या करें या क्या ना करें,
क्या कहें कब कहें किससे कहें,
मददगार ही जब छल जाता है,
कोई नया दरवाजा खुलता है।
-अनिल `अंकित’, गुरुग्राम

वसुधैव कुटुंबकम
हमारी बस्तियां
भले पक्की हो गई हैं
घरों में बन गए
शौचालय
तुम्हारे घरों की तरह
हमारे कपड़े
तुम्हारी तरह साफ
सुथरे हो गए
हमें भी मिलने लगी
दो वक़्त की रोटी
भरपेट
हमारी बेटियां तक
तुम्हारी बेटियों के साथ
पढ़ने लगी हैं
हमारी पीढ़ियां
तुम्हारी मर्जी के बगैर
खुद को गढ़ने लगी हैं
हममें से कुछ हो गए
अफ़सर बाबू प्रोफेसर
जीने लगे
बिलकुल वैसे
तुम जीते हो जैसे
पर एक बात तो है
कि इस रूप में भी
तुम्हें
हम बिलकुल पसंद नहीं
तब भी पसंद नहीं थे
जब जीते थे
पशुओं से भी बदतर
गाँव के दक्खिनी सिवान पर
तो फिर
तुम्हीं बताओ मालिक!
तुम्हारा
वसुधैव कुटुंबकम
कब तक
हमारी बस्तियों के
हाशिए पर
अटका रहेगा
जैसे झरबेरी की
कांटेदार झाड़ियों में
अटके रहते हैं
छटपटाकर
मरे हुए परिंदे!
-हूबनाथ

खफा वो हो गए
आजकल हमसे न जाने क्यों खफा वो हो गए
कह रहे हैं लोग हमसे बेवफा वो हो गए।
फाश करते हैं मिरा माजी वो सबके सामने
हम जहां मुजरिम बने हैं पारसा वो हो गए।
भूलते हैं वो हमेशा अपनी सब गुस्ताखियां
बनते थे हमदम कभी ना आशना वो हो गए।
ली गवाही भी नहीं और पैâसला भी कर दिया।
इश्क में हमको सजा दी खुद रिहा वो हो गए।
अब नहीं शिद्दत से वो करते हमारी बात भी।
मोम थे साहिब मिरे पत्थर कहां वो हो गए।।
-सीमा मिश्रा पांडेय, देवरिया (उत्तर प्रदेश)

प्रभुजी
अब फिर एक बार जंग में उतरना है
कोशिश फिर से इस बार उस पार जाना है
थोड़ा ध्यान रखना हे प्रभुजी
अब आपका ही सहारा है
जीत जाऊंगा मैं गर साथ तुम्हारा हो।
जीवन के संघर्ष से हार नहीं माना हूं
कर फतेह संघर्ष पर उसको मात दे पाऊंगा
शायद इस बार जीत जाऊंगा
यदि सिर पर हाथ तुम्हारा हो
फिर एक बार जंग में उतरा हूं
प्रभुजी साथ अब तुम्हारा हो।।
-नेहा त्रिपाठी, मुंबई

कर्मवीर
वक्तव्यों की बैसाखी, संबंधों के बोझ नहीं सहते।
कर्तव्यों की आधारशिला पर, ऊंचे दुर्ग टिके रहते।।
मृदुभाषी होकर संबंधों को कब तक छलते जाओगे।
स्वार्थ का पट नेत्रों पर डाले, स्वजनों को ना पाओगे।।
आकर्षक होता है गुलाब, सक्षम सुगंध पैâलाने में।
पर क्या वह सक्षम भी होगा, भूखे की भूख मिटाने में।।
भूखे बालक का क्रंदन सुन, जब मन व्याकुल हो जाता है।
दिखता बेबस उस क्षण गुलाब, गेहूं ही भूख मिटाता है।।
कुछ कर्मवीर निज स्वेद बहा, अति सुंदर बाग लगाते हैं।
तो शब्दवीर कर चमत्कार, शब्दों के पुष्प खिलाते हैं।।
कर्तव्यों की बलिवेदी पर कुछ अपनी भेंट चढ़ाते हैं।
तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ मूर्खों को मिल जाते हैं।।
कर्तव्यों में अभिव्यक्ति है, बस कर्मों से अभिव्यक्त करो।
बन कर्मवीर बस कर्म करो, जीवन-आलस परित्यक्त करो।।
-`शिब्बू’, गाजीपुरी

इधर-उधर की
मन का जीवन दास हो रहा
बजाकर नाक सत्य सो रहा
कहूं कैसे ठीक है सब कुछ
जब आनंद आभास खो रहा
अनुबंधों की गाठें खोलकर
संबंधों को अलविदा बोलकर
निकल रहे न जाने सब कहां
कण-कण में वैराग्य घोलकर
सुख इतना सम्मानित क्यों है
दुख सहज अवमानित क्यों है
जब राग-द्वेष सखा समय के
फिर एक अपमानित क्यों है
रहने दो जग में रहने दो
सहने दो जग को सहने दो
कठोर, नरम, कटु, मिष्ठ, खार
पलने दो जग में पलने दो
अन्य नहीं अनुमान है दोषी
रहता हरदम पास पड़ोसी
लड़ते रहते किंचित दिन-रात
करते कब कुछ राम भरोसे।
-डॉ. एम.डी. सिंह

लखनऊ
थोड़ा मुझमें, थोड़ा तुझमें
बच गया है लखनऊ।
बाकी तो चंद इमारतों में
खप गया है लखनऊ।
भीड़ में चेहरा किसी का,
अब नहीं मिलता मुझे,
लोग इतने बढ़ गए कि
घट गया है लखनऊ।
तेरे-मेरे अपने से
गुम हो गए वो चाय घर,
स्वाद के अब ब्रांड लेकर
डट गया है लखनऊ।
लहलहाती गोमती
बीते दिनों की बात है,
अब रिवर प्रâंट से नया-सा
सज गया है लखनऊ।
सुबह होते दौड़ना
और फंसना ट्रैफिक जाम में,
भागने की होड़ में कुछ
थम गया है लखनऊ।
वो जो दिखता था
तुम्हारी आंख में, अंदाज में,
दिल में मीठी याद सा अब
दब गया है लखनऊ।
एक दिन ये मुंबई-दिल्ली बनेगा
शक नहीं,
एक दिन ये पूछेगा कि,
अब कहां है लखनऊ ?
-दिवाकर सिंह, लखनऊ
पानी
नशीली आंखों में ठहरा हुआ पानी,
लगी ठेस आंखों से ढुलक गया पानी।।
दिल बेचैन सब्र-सुकून खो गया जब भी,
झरने-सा आंखों से बरस गया पानी।।
किनारे थाम न पाए उछाल इतना,
तोड़कर बंधनों को बिखर गया पानी।।
सूखे होंठ तिश्नगी है धूप गहरी है,
भरी रेत भटक रहे नहीं मिला पानी।।
तेरी चाह में भटके रात-दिन प्यासे,
बुझी न प्यास बस हमें नहीं मिला पानी।।
उमड़-घुमड़ के आए बादल लौट गए,
यूं तिश्नगी बुझाए न ओस का पानी।।
जगा `उमेश’ नई रोशनी दिखाएगा,
पानीदार वह जो बचाता है पानी।।
-डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल, मुंबई

आज की सच्चाई
मांगनेवाले बहुत हैं देनेवाले हैं कम,
अमीरों के पास पैसे बहुत हैं गरीबों के पास है दम,
नौकरी करनेवाले बहुत हैं देनेवाले हैं कम,
खामियां देखनेवाले बहुत हैं खूबियां देखनेवाले हैं कम,
अपने मतलब से जीनेवाले बहुत हैं दूसरों के लिए जीनेवाले हैं कम,
पैसे उड़ानेवाले बहुत हैं मदद करनेवाले हैं कम,
अपने दु:खों की नुमाइश करनेवाले बहुत हैं सुननेवाले हैं कम,
रोनेवाले बहुत हैं आंसू पोंछनेवाले हैं कम,
दिखावा करनेवाले बहुत हैं असल में रिश्ते निभानेवाले हैं बहुत कम,
कसमें खानेवाले बहुत हैं निभानेवाले हैं कम, बड़ी-बड़ी डींगे हांकनेवाले बहुत हैं असल बात करनेवाले हैं कम,
हिदायत देनेवाले बहुत हैं खुद उस पर चलनेवाले हैं बहुत कम,
एहसान करनेवाले बहुत हैं मदद करनेवाले हैं कम,
प्यार करनेवाले बहुत हैं निभानेवाले हैं कम,
गिरानेवाले बहुत हैं बचानेवाले हैं कम,
खूबसूरती की नुमाइश करनेवाले बहुत हैं पर असल में खूबसूरत हैं बहुत कम,
भोले बननेवाले बहुत हैं पर असल में भोले हैं बहुत कम,
ज्ञान देनेवाले बहुत हैं पर असल में ज्ञानी हैं बहुत कम,
ईश्वर की आराधना करनेवाले बहुत हैं पर भक्त हैं बहुत कम,
हर रोज मरनेवाले बहुत हैं पर मुक्ति पानेवाले हैं बहुत कम।
-रंजय कुमार, मुंबई

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