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विरासत को सरोकार बनाइए

मुंबई में फोर्ट क्षेत्र की कई ऐतिहासिक इमारतों को अग्निकांड और अन्य दुर्घटनाओं ने नष्ट कर दिया है, तो यहीं कई और इमारतें अवहेलना, तिरस्कार, साधनों की कमी, लापरवाही और कल्पनाशीलता के अभाव से अस्तित्व का संकट झेल रही हैं। ऐसे में यहां की एक प्रमुख इमारत को ढहाए जाने संबंधी मुंबई हाई कोर्ट का आदेश विरासत-सुधियों के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं।
मुंबई हाई कोर्ट ने बीते पखवारे मुंबई महानगरपालिका को निर्देश दिया है कि अगर वह आवश्यक समझे तो फोर्ट इलाके की बहुमंजिला सरूश बिल्डिंग को तत्काल ध्वस्त कर सकती है। १०० वर्ष से अधिक पुरानी सरूश बिल्डिंग क्षेत्र की सुपरिचित इमारत है। मुंबई की सबसे मशहूर सड़क डी.एन.रोड स्थित ढेरों मशहूर ऐतिहासिक महत्व की इमारतों की तरह इसका भी अपना गौरवशाली अतीत है। काल के थपेड़ों के साथ मकान मा‌लिक और किराएदारों के विवाद के कारण मरम्मत के अभाव ने इसे जर्जर कर दिया। बीती १७ मई को आए तौकते तूफान ने तीसरी मंजिल पर सामने की दीवार को ध्वस्त कर दिया, तब सुरक्षा के लिहाज से हाई कोर्ट उपरोक्त आदेश देने को बाध्य हो गई। इससे पहले लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पाेरेशन के मालिकाना हक वाली जनरल एश्योरेंस बिल्डिंग भी हाई कोर्ट के आदेश से ढहाई जा चुकी है।
अस्तित्व का संकट
फोर्ट व कोलाबा सरीखी पुराने इलाकों में सरूश बिल्डिंग सरीखी कई इमारतें हैं, जो अस्तित्व के संकट से मुकाबिल हैं। इनमें कई काल के थपेड़ों का ‌निशाना बनी हैं तो कई अन्य अग्निकांड और प्राकृतिक त्रासदियों का शिकार बन गई हैं। १९०२ में मंचेरशा चंदाभाई द्वारा बनवाई पत्थर की खूबसूरत एलिस बिल्डिंग ऐसी ही इमारतों में है, जिसे १९७३ में हुए एक भीषण अग्निकांड ने निगल लिया। एल.आई.सी. और पुरानी जी.आई.सी. बिल्डिंग अब ‘भूतपूर्व’ हो गई हैं। आग की विभीषिका ने इरुचशा हाउस पर भी असर डाला है।
फोर्ट हाउस: डी.एन. रोड की शान विशाल फोर्ट हाउस को १९८२ की एक भयानक आग ने नहीं बख्शा। १८३४ में पोरबंदर पत्थरों से बनी, विशाल अहातों वाली ग्रेड-२ए की यह आलीशान चौकोर हेरिटेज इमारत मुंबई की अन्य महत्वपूर्ण इमारतों की तरह अपने वक्त मुंबई के सबसे रसूखदार व्यक्ति रहे सर जमशेदजी जीजीभाई की देन है, जिसे उन्होंने यूरोप से लाए फर्नीचरों, झाड़-फानूस और दूसरे सजावटी सामानों से बहुत तबीयत से सजाया था। कुछ वर्ष बाद सर जीजीभाई ने बगल के भूखंड पर अपने छोटे पुत्र सोराबजी के लिए एक और महल बनवाया।
सर जीजीभाई के इस घर और तत्कालीन फोर्ट की दीवारों के बीच बहुत कम फर्क था। यह उनके प्रभाव का ही असर था कि अंग्रेज उनकी सुविधा के अनुरूप एक चौड़ी सड़क के निर्माण के लिए फोर्ट की दीवार को कई गज पीछे खिसकाने को तैयार हो गए थे। १९१४ में ब्रिटेन के डिपार्टमेंटल स्टोर इवांस प्रâेजर ने फोर्ट हाउस को खरीदकर इंपोरियम और पोर्टिको बना दि‌या। जल्द ही फोर्ट हाउस को देश के आधुनिकतम रीटेल बाजारों में गिना जाने लगा। १९८२ में आग में लगभग पूरी तरह नष्ट होने से पहले यह वेंâद्र सरकार के हैंडलूम हाउस के रूप में जाना जाता था। आग में बच गए मूल बिल्डिंग के आगे, नीचे के कुछ हिस्से आज तक देखे जा सकते हैं। नौ मंजिला नए निर्माण ने फोर्ट हाउस की मूल खूबसूरती कुछ हद तक लौटा दी है। फोर्ट हाउस ग्रेड-२ए की हेरिटेज इमारत है। अब यह दाऊदी बोहरा ट्रस्ट दावत-ए-हदिया की मिल्कियत है।
झूलेलाल हाउस: झूलेलाल हाउस हैंडलूम हाउस की ही तरह १९८६ में एक भीषण अग्निकांड में नष्ट फोर्ट के एम.जी. रोड की एक भव्य इमारत है, जिसका स्थान अब एक नवनिर्माण ने ले लिया है, जो उतना ही भव्य है। १८८५ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पहले झूलेलाल हाउस में दादाभाई नौरोजी, ए.ओ. ह्यूम, सर फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, दिनशा वाच्छा सरीखे राष्ट्रवादी नेताओं की नियमित बैठकें होती रहीं, इस लिहाज से यह ऐतिहासिक महत्व का है। झूलेलाल हाउस मूलत: एन.एम. वाडिया चैरिटेबल ट्रस्ट की संपत्ति रही।
रिद्म हाउस: मार्च, २०१५ में फोर्ट की शान जहांगीर आर्ट गैलरी का ‘समोवर कैफे’ बंद हुआ। इसके अगले वर्ष मार्च में ही उसके पड़ोसी ‘रिद्म हाउस’ ने भी अलविदा कह दिया। १९४१ में खुला रिद्म हाउस मुंबई का पहला रिटेल संगीत स्टोर था। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस म्यूजिक स्टोर की नीली दीवारों, ऊंची छत और कांच की विशाल खिड़कियों ने दशकों तक जिन संगीत प्रेमियों के लिए एक स्वप्न संसार रचा, उन्हीं की बेरुखी ने उसे बंद होने को विवश कर दिया।
रखरखाव की दरकार
फोर्ट इलाके की कई इमारतें यूनेस्को द्वारा घोषित ‘विश्व ‌विरासत’ की श्रेणी में आती हैं। दरअसल, दक्षिण मुंबई के फोर्ट व कोलाबा सरीखी पुराने इलाकों में सरूश बिल्डिंग सरीखी कई और अनमोल विरासतें ऐसी हैं, जो साधनों की कमी, लापरवाही, उदासीनता और कल्पनाशीलता के अभाव में अस्तित्व का संकट झेल रही हैं। अकेले डी.एन. रोड की महिंद्रा, काशीनाथ बिल्डिंग, खंडेलवाल भवन, किताब महल, एस्प्लेनेड हाईस्वूâल बिल्डिंग, लॉरेंस ऐंड मेयो, कॉक्स ऐंड किंग्स और प्रास्पेक्ट और अपीजे चैंबर्स, पीरामल मैंशन, आनंद भवन, कामा हाउस जैसी शानदार इमारतें अब रिस्टोरेशन और रखरखाव मांग रही हैं। मेट्रो-३ के निर्माण ने भी उनकी सुदृढ़ता को खतरा उत्पन्न कर दिया है।
दक्षिण मुंबई के कई अन्य स्मारकों की हालत भी दयनीय है। भयानक खामियों से भरा वह डिवेलपमेंट प्लॉन तो आज तक किसी दु:स्वप्न की तरह याद किया जाता है, जो कुछ वर्ष पहले घोषित हुआ था। दरअसल, चौथाई सदी से हेरिटेज वंâजर्वेशन के लिए मुंबई में कोई मानक गाइडलाइन है ही नहीं। हेरिटेज की यही हालत कमोबेश पूरे देश में है। हालत किस कदर खराब हैं, इसका अनुमान आप इस बात से लगाइए कि देश का मात्र ०.०१ प्रतिशत हेरिटेज ही संरक्षित श्रेणी में आता है। यदि यही हालत रही तो इंटैक के एक सर्वेक्षण के अनुसार देश का २७ प्रतिशत हेरिटेज अगले १० वर्षों में खत्म हो जाएगा।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)