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सुप्रीम कोर्ट की अवमानना :  मछुआरों को मुआवजा नहीं दे रहे सिडको व ओएनजीसी!

सामना संवाददाता / नवी मुंबई
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उरण, पनवेल तालुका के १,६३० मछुआरों को वित्तीय मुआवजा देने से इनकार करने और कोर्ट की अवमानना ​​के मामले में पारंपरिक मच्छीमार बचाव कृति समिति और महाराष्ट्र स्मॉल स्केल ट्रेडिशनल फिश वर्कर्स यूनियन ने ओएनजीसी, सिडको के खिलाफ नोटिस जारी करने का मन बना लिया है।
नंदकुमार पवार के मुताबिक, उरण-पनवेल क्षेत्र में विकास के नाम पर जेएनपीए, ओएनजीसी, सिडको, नवी मुंबई एसईजेड द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों के कारण मैंग्रोव्ज बड़े पैमाने पर खत्म हुए हैं। इससे पर्यावरण को भी बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। जिसका असर उरण-पनवेल इलाके के हजारों मछुआरों के परिवारों पर पड़ा और उनके सामने भुखमरी की नौबत आ गई। विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित १,६३० पारंपरिक मछुआरा परिवारों को आर्थिक सहायता मिल सके इसलिए पिछले १० सालों से मछुआरे नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल्स में लड़ाई लड़ रहे थे। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जेएनपीए, ओएनजीसी, सिडको प्रशासन को ९५ करोड़ १९ लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया था। जेएनपीए ने इस पैâसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जेएनपीए, ओएनजीसी, सिडको प्रशासन को तुरंत मुआवजा की राशि भुगतान करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जेएनपीए ने आर्थिक मुआवजे की ७० फीसदी राशि ब्याज समेत कलेक्टर को सौंप दी, जिसे १,६३० मछुआरा परिवारों में वितरित भी कर दिया गया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक साल की अवधि बीत जाने के बाद भी ओएनजीसी ने २० प्रतिशत और सिडको ने १० प्रतिशत वित्तीय मुआवजे का भुगतान नहीं किया है।

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